अरी... सोनू की मम्मी, सुनती हो... क्या है ? अरे अपने कंप्यूटर में कीड़ो, वर्म आ गया है.आप भी.. सोनू के पापा..वर्म तो पेट में होते है और कीड़े तो दांत में लगते है,तो फिर अपने कंप्यूटर में कैसे लग गये? अरी भागवान..तू तो इतना भी नहीं समझती कि"कीड़ो और वर्म "एक तरह के वायरस है,जो कंप्यूटर को ख़राब करते है.ठीक उस तरह से जैसे बैक्टीरिया मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसे इन्फेक्टेड करके बीमार बना देते है, वैसे ही ये हमारे कंप्यूटर महाशय को भी ख़राब कर देंगे. समझी न...आप तो बस दिन भर..ऑफिस में भी कंप्यूटर और घर आने पर भी कंप्यूटर. लगता है मेरी सौत को ले आये है. .. पड़ोस वाले माखनलाल जी को देखो कितने मजे की नौकरी कर रहे है और घर पर भी समय देते है.वो तो बड़े आराम से सुबह ग्यारह बजे दफ्तर के लिए निकलते है और फिर दोपहर का खाना खाने के लिए जो घर आते है, तो फिर तो तीन बजे से पहले नहीं जाते, और तो और शाम को छै बजे से पहले घर भी आ जाते है.आप ही है,जो सुबह आठ बजे जो निकलते हैं तो सीधे रात आठ बजे से पहले नहीं लौटते.अरी..अपने माखनलालजी तो सरकारी कर्मचारी है, मैं तो प्राईवेट में काम करता हूँ. अगर ऐसा करूंगा तो हमेशा के लिए घर पर ही नजर आऊंगा.अपने माखनलालजी की तो बात ही निराली है. क्यों? अरी.. उनकी चारों अंगुलियाँ घी में है और सर कढ़ाई में! ऐसा क्यों? तुम इतना भी नहीं समझती कि सरकारी नौकरी किस्मत वालों को मिलती है!उन्हें नौकरी से कोई नहीं निकाल सकता जब तक की वे चोरी न करें..अथवा रिश्वतखोरी..में न फंसे.मै तो हुक्म का ताबेदार हूँ,मौखिक आदेश पर फटाफट काम निपटाता हूँ फिर भी चौबीसों घंटे मेरे सर पर तलवार लटकी रहती है कि कब सेठ गुड बाय कह दे.
एक दिन मै किसी कारण से घर जल्दी आ गया. घर बंद था, तभी माखनलाल जी ने मुझे बुलाया और कहा,जब तक भाभी जी आती है,गरमा- गरम एक कप चाय पीते है. मैंने मन-ही-मन सोचा की आज अपने भाग खुल गये! मैंने पूछा.. कैसे चल रहा है? उन्होंने तपाक से कहा..बने रहो पगला, काम करेगा अगला.मैंने पूछा, यह क्या बडबडा रहे हो? उन्होंने कहा.. बडबडा नहीं हकीकत बयां कर रहा हूँ! सरकारी तंत्र में नौकरी करना एक कला है वो हरेक के बस की बात नहीं है. मैंने पूछा क्यों?बोले भैया.., जैसे दादाओं के,डाकुओं के, डान के फील्ड के कुछ उसूल और काम करने के तरीके होतें है,वैसे ही सरकारी तंत्र में सुचारू रूप से काम करने के अपने तरीके होतें है.जहाँ नियमानुसार,पारदर्शितापूर्वक,बिना जल्दबाजी मचाये,लखित रूप में ही काम किया जाता है,चाहे वो कितना ही अर्जेंट क्यों न हो? चाहे किसी को पसंद आये या न आये.भैया.. उस शैली में काम किया तो जिंदगी आराम से कटती है और पेंशन भी पक्की. जरा सी हुशियारी दिखाई तो बॉस आपकी सी. आर. को लड़ैया बना देगा. फिर प्रमोशन तो दूर की बात और यदि किसी केस में फंस गए तो फंड,पेंशन सब जब्त.. जब तक फैसला न हो जाये.वैसे भी वहां प्रमोशन काबिलियत से नहीं, सीनियरिटी कम फिटनेस के आधार पर होते है,प्राइवेट जैसे नहीं."चट मंगनी पट ब्याव, नहीं पटा तो यहाँ से जाओ." माखन लाल ने चाय की एक लम्बी फुरकी ली और कहा एक सर्वे के अनुसार सरकारी दफ्तरों में लगभग चालीस प्रतिशत लोग ही सकारात्मक सोच एवं प्रवृत्ति रखतें है और ये लोग ही नकारात्मक सोच वालों को ढकते है.यदि नकारात्मक सोच वाले लोग अपनी सोच एवं प्रवृत्ति बदलें तो देश कितना आगे बढेगा,पर ये लोग है कि अपनी सोच, प्रवृत्ति एवं प्रकृति बदलने को तैयार ही नहीं. ये ही लोग वर्किंग एन्विरौन्मेंट को प्रदूषित करते है.उनका अपना अलग फंडा है "काम कर न कर, काम की फिक्र जरूर कर, फिक्र कर और उसका अपने साहब जिक्र जरूर कर,जिक्र तो कर पर काम करने वाले को उंगली कर,वो भी बदल-बदल के कर,उसकी चुगली बड़े अफसर से कर,फिर भी मन न माना तो एक ही चुगली,अफसर बदल के कर." भैया माखन लाल मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है.. खैर तुम्हे कुछ समझ में भी नहीं आयेगा.आगे बताता हूँ.. ये लोग बड़े ऊँचे दर्जे के होते है.ये टेंशन लेते नहीं बल्कि दूसरों को टेंशन देते है. टेंशन देकर पेंशन लेते है.इनका मुख्य फंडा होता है. "पालोगे टेंशन,तो बीबी उठाएगी पेंशन, भाड़ में जाये जनता,अपना काम बनता. देते रहो डोनेशन,पाते रहो प्रमोशन" इसके पहले कि साहब इनके लिए सरदर्द बने,ये लोग साहब के लिए सरदर्द बन जाते है.. ये लोग दूसरों को गाना सुनाते है, सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है.. पर इनका खुदा तो कार्यालय में कार्यालय का साहब होता है,सचिवालय में सचिव और मंत्रालय में मंत्री!भैया यदि इन्हे बाबूलाल..जैसा अधिकारी मिल जाये,जो नये प्रतिभावान इंजिनीयर से भी मशीन के नट-बोल्ट गिनवाने जैसे काम में यकीन रखता है.तो बेचारा इंजिनीयर..हाथ की मुट्ठी भीचकर,दांत दबाकर,मन मसोस कर चला जाता है.मन ही मन बडबडाता,गलियां बकता है,साला.. मेरा भी दिन आयेगा! ये रिटायर होगा तो दिखाऊंगा.यदि आपने,साहब को दिमाग दिया तो बोलेगा "फॉलो माय इंस्ट्रक्शन".. ऐसे वक्त ये लोग,बड़ी धूर्तता से अपना पैंतरा बदल लेते है,और साहब के करीब हो जाते है. ये लोग अपना डिग्री,डिप्लोमा और हुशियारी,कार्यालय में घुसते समय बाहर बैठे सिक्युरिटी गार्ड के पास रखकर आते है और घर वापस जाते समय लेकर जाते है.कहते है सबसे बड़े साब के चपरासी, ड्राइवर और पी.ऐ.से कभी पंगा मत लो. काम धेले भर का मत करो सिर्फ यस सर-यस सर करो आने जाने का टाइम मेंटेन करो तो रामपाल जैसा आदमी भी द्वारपाल का काम नहीं कर पायेगा. ऐसे में तो काम भी फिट और दाम भी फिट. भैया... माखन लाल तुमने तो बहुत ऊँची- ऊँची दे दी. मेरे तो ऊपर से निकल गई.चलो समझाए देता हूँ सुनो.. ..
एक दिन मै किसी कारण से घर जल्दी आ गया. घर बंद था, तभी माखनलाल जी ने मुझे बुलाया और कहा,जब तक भाभी जी आती है,गरमा- गरम एक कप चाय पीते है. मैंने मन-ही-मन सोचा की आज अपने भाग खुल गये! मैंने पूछा.. कैसे चल रहा है? उन्होंने तपाक से कहा..बने रहो पगला, काम करेगा अगला.मैंने पूछा, यह क्या बडबडा रहे हो? उन्होंने कहा.. बडबडा नहीं हकीकत बयां कर रहा हूँ! सरकारी तंत्र में नौकरी करना एक कला है वो हरेक के बस की बात नहीं है. मैंने पूछा क्यों?बोले भैया.., जैसे दादाओं के,डाकुओं के, डान के फील्ड के कुछ उसूल और काम करने के तरीके होतें है,वैसे ही सरकारी तंत्र में सुचारू रूप से काम करने के अपने तरीके होतें है.जहाँ नियमानुसार,पारदर्शितापूर्वक,बिना जल्दबाजी मचाये,लखित रूप में ही काम किया जाता है,चाहे वो कितना ही अर्जेंट क्यों न हो? चाहे किसी को पसंद आये या न आये.भैया.. उस शैली में काम किया तो जिंदगी आराम से कटती है और पेंशन भी पक्की. जरा सी हुशियारी दिखाई तो बॉस आपकी सी. आर. को लड़ैया बना देगा. फिर प्रमोशन तो दूर की बात और यदि किसी केस में फंस गए तो फंड,पेंशन सब जब्त.. जब तक फैसला न हो जाये.वैसे भी वहां प्रमोशन काबिलियत से नहीं, सीनियरिटी कम फिटनेस के आधार पर होते है,प्राइवेट जैसे नहीं."चट मंगनी पट ब्याव, नहीं पटा तो यहाँ से जाओ." माखन लाल ने चाय की एक लम्बी फुरकी ली और कहा एक सर्वे के अनुसार सरकारी दफ्तरों में लगभग चालीस प्रतिशत लोग ही सकारात्मक सोच एवं प्रवृत्ति रखतें है और ये लोग ही नकारात्मक सोच वालों को ढकते है.यदि नकारात्मक सोच वाले लोग अपनी सोच एवं प्रवृत्ति बदलें तो देश कितना आगे बढेगा,पर ये लोग है कि अपनी सोच, प्रवृत्ति एवं प्रकृति बदलने को तैयार ही नहीं. ये ही लोग वर्किंग एन्विरौन्मेंट को प्रदूषित करते है.उनका अपना अलग फंडा है "काम कर न कर, काम की फिक्र जरूर कर, फिक्र कर और उसका अपने साहब जिक्र जरूर कर,जिक्र तो कर पर काम करने वाले को उंगली कर,वो भी बदल-बदल के कर,उसकी चुगली बड़े अफसर से कर,फिर भी मन न माना तो एक ही चुगली,अफसर बदल के कर." भैया माखन लाल मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है.. खैर तुम्हे कुछ समझ में भी नहीं आयेगा.आगे बताता हूँ.. ये लोग बड़े ऊँचे दर्जे के होते है.ये टेंशन लेते नहीं बल्कि दूसरों को टेंशन देते है. टेंशन देकर पेंशन लेते है.इनका मुख्य फंडा होता है. "पालोगे टेंशन,तो बीबी उठाएगी पेंशन, भाड़ में जाये जनता,अपना काम बनता. देते रहो डोनेशन,पाते रहो प्रमोशन" इसके पहले कि साहब इनके लिए सरदर्द बने,ये लोग साहब के लिए सरदर्द बन जाते है.. ये लोग दूसरों को गाना सुनाते है, सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है.. पर इनका खुदा तो कार्यालय में कार्यालय का साहब होता है,सचिवालय में सचिव और मंत्रालय में मंत्री!भैया यदि इन्हे बाबूलाल..जैसा अधिकारी मिल जाये,जो नये प्रतिभावान इंजिनीयर से भी मशीन के नट-बोल्ट गिनवाने जैसे काम में यकीन रखता है.तो बेचारा इंजिनीयर..हाथ की मुट्ठी भीचकर,दांत दबाकर,मन मसोस कर चला जाता है.मन ही मन बडबडाता,गलियां बकता है,साला.. मेरा भी दिन आयेगा! ये रिटायर होगा तो दिखाऊंगा.यदि आपने,साहब को दिमाग दिया तो बोलेगा "फॉलो माय इंस्ट्रक्शन".. ऐसे वक्त ये लोग,बड़ी धूर्तता से अपना पैंतरा बदल लेते है,और साहब के करीब हो जाते है. ये लोग अपना डिग्री,डिप्लोमा और हुशियारी,कार्यालय में घुसते समय बाहर बैठे सिक्युरिटी गार्ड के पास रखकर आते है और घर वापस जाते समय लेकर जाते है.कहते है सबसे बड़े साब के चपरासी, ड्राइवर और पी.ऐ.से कभी पंगा मत लो. काम धेले भर का मत करो सिर्फ यस सर-यस सर करो आने जाने का टाइम मेंटेन करो तो रामपाल जैसा आदमी भी द्वारपाल का काम नहीं कर पायेगा. ऐसे में तो काम भी फिट और दाम भी फिट. भैया... माखन लाल तुमने तो बहुत ऊँची- ऊँची दे दी. मेरे तो ऊपर से निकल गई.चलो समझाए देता हूँ सुनो.. ..
माखन नाम है मेरा,माखनलाल,
पतली कर देता हूँ सबकी दाल,
मनो मेरी सलाह तो कट जाये सालों साल,
गर लगाया अपना दिमाग तो हो जाओगे बेहाल.
ठीक है भैया,चलता हूँ और तुम्हारी सलाह लापतागंज में मिस्टर एंड मिसेस शर्मा इलाहाबादवाले को भिजवा देता हूँ.
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"
ठीक है भैया,चलता हूँ और तुम्हारी सलाह लापतागंज में मिस्टर एंड मिसेस शर्मा इलाहाबादवाले को भिजवा देता हूँ.
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"

