Tuesday, February 1, 2011

घोटाला वर्णमाला

क्यों ? घुटलू ...  ए, बी, सी, डी..याद है ? हाँ... मास्साब... अरे...! तुझ जैसे गधे... को ए, बी,सी, डी...याद कैसे  हो गई? अरे... मास्साब... अब तो  किसी को भी याद  हो सकती है ! क्यों ? ......मास्साब... देश में रोज एक घोटाला होता है!.. है !.. न !...और अंग्रेजी वर्णमाला में  २६ अक्षर है, अगर वो भी हिंदी वर्णमाला की तरह ५२ होते... तो.. भी .. कम पड़ जाते ! ...फिर  याद रखने की क्या जरूरत ! ... ठीक है.  सुनाओ ?.. घुटलू ने बोलना शुरू किया.  मास्साब  "ए" से आदर्श सोसायटी घोटाला, "बी" से बोफोर्स घोटाला, "सी" से चारा घोटाला, "डी" से डी डी ए/ दिनेश डालमिया स्टॉक घोटाला, "इ" से एनरोन घोटाला, "ऍफ़" से फर्जी पासपोर्ट घोटाला, "ग(जी)" से गुलाबी चना घोटाला, "एच" से हथियार/ हवाला/हसन अली खान टेक्स घोटाला. बस.. बस... नहीं मास्साब. आज तो मै पूरी ए, बी,सी, डी.. सुनाके ही रहूँगा. ठीक है... ठीक है.. "आई" से आई पी एल घोटाला, "जे" से जगुआर/ जीप  घोटाला, "के" से कॉमन वेअल्थ गेम्स /केतन पारीख सिक्यूरिटी घोटाला ,"एल" से लोटरी / एल आई सी घोटाला, "एम्" से मनरेगा/ मधु कोड़ा माइन घोटाला, "एन" से नागरवाला घोटाला, "ओ" से आयल/ ओरिसा माइन घोटाला, "पी" से पनडुब्बी/ पंजाब सिटी सेण्टर घोटाला, "क्यू" से कोटा परमिट घोटाला, "आर" से राशन/ राईस एक्सपोर्ट घोटाला, "एस" सत्यम/शेयर/सागौन प्लान्टेशन घोटाला, "टी" से तेलगी/ ताबूत /टेलिकॉम/ टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, "यू" से यूरिया/ यू टी आए. घोटाला, "वी" से वीसा (कबूतरबाज़ी) घोटाला, "डब्लू" वेपन/ व्हीट घोटाला, "एक्स " एक्सेस  बैंक घोटाला, "वाय" से यार्न  घोटाला, "जेड" से  ज़मीन घोटाला... आदि. शाब्बास... घुटलू. तुमने  तो कमाल कर दिया. आज क्लास को मै नहीं तुम पढ़ाओगे. तुमने तो "ग" गणेश का साबित कर दिया. 
   मास्साब, पहले, बच्चो को स्कूल में पढाने पूर्व  शुभारम्भ  करने के लिए  "ग" गणेश का सिखाया जाता था. हमारे भारत वर्ष में भगवान गणेश को बुद्धि का दाता माना जाता है, पर शायद  कुछ ज्यादा समझदार नेताओं  द्वारा पुस्तकों में  "ग" गणेश का, के स्थान पर "ग" गधे का लाया गया और पढाया जाने लगा. उन्हें वोट की खातिर गणेश जी रास नहीं आये भले ही हमारे सम्माननीय नेता जी चुनाव में नाम दाखिल करने से पहले गणेश वंदना करके ही निकलते  हों! पर  पता नहीं उन्हें कैसे अक्ल आई! कि, "ग" गधे का, के स्थान पर "ग" गमले का, का बीजारोपण किया गया. फिर क्या था! वह गमला रुपी पौधा वृक्ष में तब्दील हो गया. उससे निकले फल और बीज  इतने पौष्टिक निकले कि नई पैदावार ने गुल खिलाना शुरू किया, जिसने शिष्टाचार पूर्वक भ्रष्टाचार करना शुरू कर दिया. सब कुछ बिकता है... ! की मानसिकता ने अपने आचार-विचार संस्कृति को मात्र किताबों तक और मूल्यों पर आधारित शिक्षा को भाषणों तक ही सीमित कर दिया है!. पैसा कमाने की अंधी  दौड़ ने जैसे नैतिकता, ईमानदारी को एक प्रतीक चिन्ह सा बना दिया है. आज आत्मीयता, व्यावहारिकता में और सेवा, व्यावसायिकता में बदल गई है. बेईमानी का काम ईमानदारी से होता है. सेवा शुल्क अदा कीजिये... और एट होम सर्विस पाईये..., की नई घुटी  ने शिष्टता पूर्वक छोटी- छोटी हेरा-फेरी से लेकर बड़े घपलो और सुपर घोटालो तक का सफ़र बड़ी आसानी से पूरा किया है!   हिंदी वर्णमाला में "ग " के बाद "घ" आता है.  मास्साब अब तो 'घ ' का जमाना आ गया है. "घ" ऐसा घुटा है कि आज गाँव- गाँव में बच्चों कि जुबान पर "घ' बोला कि तपाक से जवाब मिलाता है, 'घ" से  घो...टा...ला...!
     मास्साब..जब से घोटालेबाज  शीला की जवानी का उपयोग कर और मुन्नी  को बदनाम करके अपने घोटालो  को अंजाम देने लगे,तब से नित नए घोटालो की बहार आने लगी है फिर  नैतिकशिक्षा कि क्या जरूरत ? घोटाला मतलब घोट.. डाला...घोटालेबाजों ने "घ" के कणों को पीस-पीस कर इतना महीन बना लिया और उसकी घुटी  का ऐसा घूँट बनाकर पिया है  कि  दुनिया की ऐसी कोई फार्मास्युटिकल कंपनी नहीं है,जिसके पास इसका एंटीडोट हो, क्योंकि हमाम में सब वस्त्रहीन है. पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन में अमृत के आलावा ऐसे कई रत्न निकले जिससे  सभी को लाभ पहुंचा. आज स्वर्ग में बैठे देवता और पाताल में बैठे दानव भी यह सोचने को मजबूर है कि काश!.. अमृत मंथन में घोटाले जैसा अप्रतिम रत्न पहले क्यों नहीं निकला ! हमारे सम्माननीय  घोटालेबाज  इतने महान है, जिन्होंने नीलकंठ को भी पीछे छोड़ दिया और विष से भी विषारी घोटाले जैसा रत्न अपने दिमाग से निकाला! उन्हें समुद्र मंथन कि क्या जरूरत ! वे तो हमेशा मस्तिष्क मंथन में लगे रहते  है कि कब कौन सा घोटाला किया जाय !यह तो सभी जानते है कि भ्रष्टाचार कि गंगा गंगोत्री से निकलती है और अंत में अनैतिकता  के समुद्र में मिलकर एक हो जाती है. हमारे आदरणीय... जब तक घोटाले करते है, तब तक उनका हाजमा तंदरुस्त रहता है, जैसे ही उनका घोटाला उजागर होता है, उनका हाजमा ख़राब हो जाता है और  उनके अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जाती है. आज घोटालेबाजों कि समाज में खासी इज्ज़त है. एक तो वो पकडे नहीं जाते, और यदि पकडे भी गए तो उन्हें जेल में वी.आई.पी.ट्रीटमेंट मिलता है. इतना सम्मान तो अच्छा काम  करने पर भी नहीं मिलता ! आज देश पर न्योछावर होने पर राजनीति कि जाती है और  उनका परिवार भी संकट में जीता है,परन्तु घोटाला करने पर मान सम्मान इतना बढ़ जाता है  कि आपको सारी दुनिया एक ही झटके में जानने लगाती है. स्मारक बनाये जाते है! इतना ही नहीं..लम्बे समय बाद जब घोटालेबाजो को क्लीन चिट  मिल जाती है, तो उनका आत्मसम्मान दुगना हो जाता है और वे दूसरा घोटाला करने की तैयारी करने में लग जाते  है! जैसे बूँद बूँद से घड़ा भरता है और घूँट-घूँट से प्यास बुझती है, वैसे ही घट-घट में घोटाले हो रहे है.
मास्साब,मैंने     पतंगबाज,तलवारबाज,कबूतरबाज,दगाबाज,निशानेबाज,धोखेबाज,सौदेबाज,झान्सेबाज,सट्टेबाज,जाम्बाज़, कलाबाज़,   और घोटालेबाज सुने है. लेकिन,  यह निश्चय किया है कि मै, तो बड़ा होके एक प्रतिष्ठित घोटालेबाज बनूँगा और घोटाला यूनिवर्सिटी खोलूँगा. घोटाले का मैनेजमेंट फंडा शास्त्रोक्त रूप से दूंगा, ताकि नए-नए घोटालेबाज तैयार कर सकूं.वैसे भी आजकल अख़बारों में, न्यूज़ में और लोगो में घोटालों की ही चर्चा होती है.मेरे विचार में सरकार ने घोटाले को कानूनी रूप से मंजूरी दे देनी चाहिए ! क्योंकि जब कानून बनाने वालों से लेकर कानून लागू करने वाले सभी उसमे शामिल हो तो फिर देर किस बात की....! देश के एक प्रमुख उद्योगपति ने सार्वजानिक रूप से कहा कि उनसे रिश्वत मांगी गई, पर... इस देश के हर नागरिक को कहीं न कही रिश्वत देना पड़ती है, पर वो बोल नहीं सकता क्योंकि वह गूंगा है!                                                                                                          क्यों मास्साब!आपकी शिक्षा और ए,बी,सी,डी दोनों काम की नहीं है!मुझे तो घोटालेवाली ए, बी,सी, डी..आती है . शिक्षक के माथे पर पसीना था. चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण के पुजारी हतप्रभ थे !सोच रहे थे.. हम कहाँ से कहाँ जा रहे है....? घोटालेबाज तो आदर्शवादी होते है, उनकी पूँछ कुत्ते की तरह और तासीर जलेबी  की तरह सीधी होती है! क्यूँ... मास्साब... अब तो समझ गए न ? मास्साब.. ! यह है मेरी... घोटाले कि वर्णमाला... अच्छा....   अब बहुत अच्छी  तरह समझ में  आ गया.. कि तुम्हारा नाम घुटलू... क्यों  रखा है ! 
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"