Friday, July 23, 2010

आस-पास की प्रकृति

माखनलाल की सलाह !
अरी... सोनू की मम्मी, सुनती हो... क्या है ? अरे अपने कंप्यूटर में कीड़ो, वर्म आ गया है.आप भी.. सोनू के पापा..वर्म तो पेट में होते है और कीड़े तो दांत में लगते है,तो फिर अपने कंप्यूटर में कैसे लग गये? अरी भागवान..तू तो इतना भी नहीं समझती कि"कीड़ो और वर्म "एक तरह के वायरस है,जो कंप्यूटर को ख़राब करते है.ठीक उस तरह से जैसे बैक्टीरिया मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसे इन्फेक्टेड करके बीमार बना देते है, वैसे ही ये हमारे कंप्यूटर महाशय को भी ख़राब कर देंगे. समझी न...आप तो बस दिन भर..ऑफिस में भी कंप्यूटर और घर आने पर भी कंप्यूटर. लगता है मेरी सौत को ले आये है. .. पड़ोस वाले माखनलाल जी को देखो कितने मजे की नौकरी कर रहे है और घर पर भी समय देते है.वो तो बड़े आराम से सुबह ग्यारह बजे दफ्तर के लिए निकलते है और फिर दोपहर का  खाना खाने के लिए जो घर आते है, तो फिर तो तीन बजे से पहले नहीं जाते, और तो और शाम को छै बजे से पहले घर भी आ जाते है.आप ही है,जो सुबह आठ बजे जो निकलते हैं तो सीधे रात आठ बजे से पहले नहीं लौटते.अरी..अपने माखनलालजी तो सरकारी कर्मचारी है, मैं तो प्राईवेट में काम करता हूँ. अगर ऐसा करूंगा तो हमेशा के लिए घर पर ही नजर आऊंगा.अपने माखनलालजी की तो बात ही निराली है. क्यों? अरी.. उनकी चारों अंगुलियाँ घी में है और सर कढ़ाई में! ऐसा क्यों? तुम इतना भी नहीं समझती कि सरकारी नौकरी किस्मत वालों को मिलती है!उन्हें नौकरी से कोई नहीं निकाल सकता जब तक की वे चोरी न करें..अथवा रिश्वतखोरी..में न फंसे.मै तो हुक्म का ताबेदार हूँ,मौखिक आदेश पर फटाफट काम निपटाता हूँ फिर भी चौबीसों घंटे मेरे सर पर तलवार लटकी रहती है कि कब सेठ गुड बाय कह दे.
एक दिन मै किसी कारण  से घर जल्दी आ गया. घर बंद था, तभी माखनलाल जी ने मुझे बुलाया और कहा,जब तक भाभी जी आती है,गरमा- गरम एक कप चाय पीते है. मैंने मन-ही-मन सोचा की आज अपने भाग खुल गये! मैंने पूछा.. कैसे चल रहा है? उन्होंने तपाक से कहा..बने रहो पगला, काम करेगा अगला.मैंने पूछा, यह क्या बडबडा रहे हो? उन्होंने कहा.. बडबडा नहीं हकीकत बयां कर रहा हूँ! सरकारी तंत्र में नौकरी करना एक कला है वो हरेक के बस की बात नहीं है. मैंने पूछा क्यों?बोले भैया.., जैसे दादाओं के,डाकुओं के, डान के फील्ड के कुछ उसूल और काम करने के तरीके होतें है,वैसे ही सरकारी तंत्र में सुचारू रूप से काम करने के अपने तरीके होतें है.जहाँ नियमानुसार,पारदर्शितापूर्वक,बिना जल्दबाजी मचाये,लखित रूप में ही काम किया जाता है,चाहे वो कितना ही अर्जेंट क्यों न हो? चाहे किसी को पसंद आये या न आये.भैया.. उस शैली में काम किया तो जिंदगी आराम से कटती है और पेंशन भी पक्की. जरा सी हुशियारी दिखाई तो बॉस आपकी सी. आर. को लड़ैया बना देगा. फिर प्रमोशन तो दूर की बात और यदि किसी केस में फंस गए तो फंड,पेंशन सब जब्त.. जब तक फैसला न हो जाये.वैसे भी वहां प्रमोशन काबिलियत से नहीं, सीनियरिटी कम फिटनेस के आधार पर होते है,प्राइवेट जैसे नहीं."चट मंगनी पट ब्याव, नहीं पटा तो यहाँ से जाओ." माखन लाल ने चाय की एक लम्बी फुरकी ली और कहा एक सर्वे के अनुसार सरकारी दफ्तरों में लगभग चालीस प्रतिशत लोग ही सकारात्मक सोच एवं प्रवृत्ति रखतें है और ये लोग ही नकारात्मक सोच वालों को ढकते है.यदि नकारात्मक सोच वाले लोग अपनी सोच एवं प्रवृत्ति बदलें तो देश कितना आगे बढेगा,पर ये लोग है कि अपनी सोच, प्रवृत्ति एवं प्रकृति बदलने को तैयार ही नहीं. ये ही लोग वर्किंग एन्विरौन्मेंट को प्रदूषित करते है.उनका अपना अलग फंडा है "काम कर न कर, काम की फिक्र जरूर कर, फिक्र कर और उसका अपने साहब जिक्र जरूर कर,जिक्र तो कर पर काम करने वाले को उंगली कर,वो भी बदल-बदल के कर,उसकी चुगली बड़े अफसर से कर,फिर भी मन न माना तो एक ही चुगली,अफसर बदल के कर." भैया माखन लाल मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है.. खैर तुम्हे कुछ समझ में भी नहीं आयेगा.आगे बताता हूँ.. ये लोग बड़े ऊँचे दर्जे के होते है.ये टेंशन लेते नहीं बल्कि दूसरों को टेंशन देते है. टेंशन देकर पेंशन लेते है.इनका मुख्य फंडा होता है. "पालोगे टेंशन,तो बीबी उठाएगी पेंशन, भाड़ में जाये जनता,अपना काम बनता.  देते रहो डोनेशन,पाते रहो प्रमोशन"  इसके पहले कि साहब इनके लिए सरदर्द बने,ये लोग साहब के लिए सरदर्द बन जाते है.. ये लोग दूसरों को गाना सुनाते है, सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है.. पर इनका खुदा तो कार्यालय में कार्यालय का साहब होता है,सचिवालय में सचिव और मंत्रालय में मंत्री!भैया यदि इन्हे बाबूलाल..जैसा अधिकारी मिल जाये,जो नये प्रतिभावान इंजिनीयर से भी मशीन के नट-बोल्ट गिनवाने जैसे काम में यकीन रखता है.तो बेचारा इंजिनीयर..हाथ की मुट्ठी भीचकर,दांत दबाकर,मन मसोस कर चला जाता है.मन ही मन बडबडाता,गलियां बकता है,साला.. मेरा भी दिन आयेगा! ये रिटायर होगा तो दिखाऊंगा.यदि आपने,साहब को दिमाग दिया तो बोलेगा "फॉलो माय इंस्ट्रक्शन".. ऐसे वक्त ये लोग,बड़ी धूर्तता से अपना पैंतरा बदल लेते है,और साहब के करीब हो जाते है.  ये लोग अपना डिग्री,डिप्लोमा और हुशियारी,कार्यालय में घुसते समय बाहर बैठे सिक्युरिटी गार्ड के पास रखकर आते है और घर वापस जाते समय लेकर जाते है.कहते है सबसे बड़े साब के चपरासी, ड्राइवर और पी.ऐ.से कभी पंगा मत लो. काम धेले भर का मत करो सिर्फ यस सर-यस सर करो आने जाने का टाइम मेंटेन करो तो रामपाल जैसा आदमी भी द्वारपाल का काम नहीं कर पायेगा. ऐसे में तो काम भी फिट और दाम भी फिट. भैया... माखन लाल तुमने तो बहुत ऊँची- ऊँची दे दी. मेरे तो ऊपर से निकल गई.चलो समझाए देता हूँ सुनो.. ..

माखन नाम है मेरा,माखनलाल,
पतली कर देता हूँ सबकी दाल,
 मनो मेरी सलाह तो कट जाये सालों साल,
गर लगाया अपना दिमाग तो हो जाओगे बेहाल.
 ठीक है भैया,चलता हूँ और तुम्हारी सलाह लापतागंज में मिस्टर एंड मिसेस शर्मा इलाहाबादवाले को भिजवा देता हूँ.
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"

Sunday, July 11, 2010

अब लौकी बेचारी क्या करे !

कुछ (एक-दो) दिन पहले मैंने एक निजी चैनल पर समाचार देखा कि एक वैज्ञानिक की लौकी के जूस पीने से मौत हो गई,और उनकी पत्नी की हालत गंभीर थी तथा उनका इलाज चल रहा था.सुनकर ख़राब लगा. सर्वप्रथम मै पीड़ित परिवार के प्रति सहानूभूति व्यक्त करता हूँ और परमपिता परमेश्वर से उनकी आत्मा की शांति हेतु प्रार्थना करता हूँ.खबर वाकई विचलित कर देने वाली थी,पर अब बिचारी लौकी का क्या दोष! जो लोग एकदम उसके पीछे ही पड़ गये.असल हमारे किसानो को हरित क्रांति के बादसे पैदावार बढाने का चस्का जो लग गया है, वो खेतों में रासायनिक खाद,कीड़ों को मारने हेतु जहरीली दवाओं का छिडकाव करते है तथा साइज़ बढाने के चक्कर में इंजेक्शन भी लगाते है. लौकी बेचारी तो एकदम भोंदू की तरह है उसमें उत्तम गुण होते हुए भी बरसों से मरीजों के सिवाय उसको कोई नहीं पूछता था.यदि कोई डिब्बे में लौकी की सब्जी लाये तो उसे यह सुनने को मिलता था की यह तो मरीजों का खाना है.पनीर-शनीर क्यों नहीं लाये? सब उसकी खिल्ली उड़ाते थे.यह तो बाबा रामदेव की कृपा है,जिसने उसको सबका चहेता बना दिया, और उसका मान भी बढ़वा दिया,वरना जब वैद्यराज जी लौकी खाने को कहते तो अच्छे-अच्छे लोग नाक-भों सिकोड़ने लगते कि कब इससे पिंड छूटेगा,लेकिन अब तो पिंडदान के समय भी लौकी को बाजू में रखने कि नौबत आ गई है!गुणधर्म में तो लौकी पहले जैसी थी वैसे आज भी है परन्तु अब तो वो लोगों की इतनी प्यारी हो गई है कि पार्टियों में हलुए के रूप में भी दिखाई देती है,मधुमेह वाला भी इसे बड़े चाव से खाता है तथा बाद में बाबा रामदेव कि जय बोलकर एक टेबलेट भी खा लेता है.इस ससुरी चटोरी जीभ ने उसकी कीमत जो बढ़ा दी है.यह जीभ या तो कैची कि तरह चलेगी या फिर चटोरों का साथ देगी.आज अधिकतर लोगो को मधुमेह से पीड़ित कराने में इस चटोरी जीभ का बहुत बड़ा योगदान है, जो नित नये व्यंजनों को चखने में बेकाबू हो जाती है और परिणाम मनुष्य को भोगना पड़ता है.मनुष्य है जो खाने पर नियंत्रण रखने को तैयार नहीं,चाहे फिर गोली क्यों न खानी पड़े.सर में दर्द पर दर्द निवारक गोली खायेगा,एसिडिटी बढ़ने पर एंटासिड खायेगा पर बुद्धिजीवी होने के नाते यह विचार नहीं करेगा कि सर दर्द क्यों? एसिडिटी क्यों?अपने शास्त्रों में कहा गया है कि ज्यादा आम खाने पर चार जामुन खाले,ज्यादा जामुन खाने पर एक आम खाले, असल में आम मीठा होता है और अम्लता निर्माण करता है तथा जामुन कसैला होता है वो आम के अफरे को दूर करता है.कहने का तात्पर्य यह है कि सिस्टम को प्राकृतिक रूप से बेलेंस करें.एक और कहावत है कि क्वांर,कार्तिक,करेला दही,मरो नहीं,तो पड़ो सही.सैकड़ो वर्षों पूर्व लिखी गई ये पंक्तियाँ एकदम सटीक है,परन्तु आदमी है की मनाता ही नहीं.उसकी जीभ उसे ललचाये रहती है.वैसे किसी भी फल का ताज़ा रस फायदा करता है, निकलकर देर तक रखा हुआ नहीं.शास्त्र के अनुसार कड़वा रस रेचक का कार्य करता है,जो पेट साफ करने में सहायक होता है.अतःकिसी भी फल का रस पीने के पूर्व उसके कडवेपन की जाँच अवश्य कर लेना चाहिये अन्यथा परिणाम हम देख चुके है.बरसों पहले ऐसी ही एक घटना मेरे एक मित्र के साथ घट चुकी है. भाई साहब बाबा रामदेव के नियमित प्रवचन सुना करते थे.वे उनसे प्रभावित थे.उन्होंने लौकी के रस का नियमित सेवन करना प्रारम्भ कर दिया था.एक दिन राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर उन्हें झंडा वंदन को जाना था. भाई साहब ने लौकी का रस निकाला और रख दिया. फिर वे झंडा वंदन के लिए चले गये. वहां से आकर उन्होंने रस पिया और फिर दूसरे कार्यक्रम के निकालने वाले थे कि एकाएक पेट में गड़बड़ शुरू हो गई. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया.उनसे पूछने पर पता चला कि जल्दबाजी में उन्होंने खाली पेट लौकी का रस पिया था,जो कि कडवा था.खैर भाई साहब तो बच गये पर कड़वी लौकी हमेशा के लिये असर कर गई.मुझे वह कहावत याद आती है, "अब पछतावत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत." बहन लौकी हमें सीख देती है कि पहले अपनी तासीर को समझो फिर उपयोग किये जाने वाले पदार्थ के गुणधर्म को समझो तत्पश्चात ही उसे अपनाओ अन्यथा परिणाम गंभीर होंगे?जिसे बाबा ने हीरो बनाया उसे हम नासमझी में जीरो बनाने पर तुले है. तभी तो बेचारी लौकी कहने को मजबूर है कि गरीब कि लुगाई, सब कि भौजाई. मेरा क्या कसूर? मै क्या करूं.आप स्वयं ही सुधर जाइये!

Wednesday, June 30, 2010

" नहीं होती तो क्यों रिसती "




दिसम्बर का महिना कडकडाती ठण्ड, चरों तरफ सन्नाटा, आधी रात का समय लोग अपने -अपने घरों में ... कि अचानक भोंपू की आवाज़ आती है और आसपास के लोग
अपने-अपने घरों से निकलकर आगे की तरफ भागते हैं, उन्हें लगता है की आग लग गई है. पहुँचाने पर पता चलता है कि आग नहीं गैस रिसी है. वापस मुड़कर लोगों का जत्था अपने-अपने घरों की और लौटने लगता है कि उन्हें महसूस होता है जैसे किसी ने उनका गला दबा दिया हो, आँखों में जलन,फेफड़ों में कसाव इसके साथ ही,एक-एक करके गिरते जाना.जो कोई भी उसके रास्ते में आया उसने उन सबको अपने आगोश में ले लिया और बदले में दी चिर निद्रा. यह सिलसिला चलता रहा और अंत मौत.जो सायरन बजने वाली चार दिवारी में थे बच गए.यह कोई नत्जियों पर फिल्माई गई चित्रपट का दृश्य नहीं अपितु वीभत्स और रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई थी. आप समझ ही गए होंगे की मैं किस मंजर की बात कर रहा हूँ. मात्र आधे घंटे में चालीस टन गैस का रिसना कई त्रुटियों की तरफ इशारा करता है.
इस तांडव रुपी घटना को छब्बीस वर्ष बीत गए जो उस गैस के संपर्क में आये वो तो काल के गाल में समां गए और जो बच गए वो भी अपंगता से नहीं बच पाए, जिनमें थोड़ी बहुत भी जीने की आस थी वो तो न्याय सुनाने के बाद खत्म हो गयी. इसको हम बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों की दादागिरी कहें या सरकार की लाचारी या फिर हमारे कानून का अत्यधिक लचीलापन, जो तो पीड़ितों को न्याय दे पाया और ही एंडरसन जैसों को सजा दे पाया, इसे हम अपनी विवशता कहें या हमारा दब्बूपन! ऐसा लगता है हमारी सरकार,हमारा कानून मजबूर प्रतीत होता है. जहाँ कानून द्वारा सजा दिए जाने के बाद भी अफजल गुरु जैसे आतंकियों की सजा को अमल में लाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है तो भोपाल के केस में हम लोगों के द्वारा न्याय की उम्मीद रखना हमारी एक बड़ी भूल थी,क्योंकि जब हमारे ही मंत्री,संत्री ही एंडरसन जैसों की खिदमत में लगे हों, और जनता का दर्द सत्ता के गलियारों, रसूखदारों के बीच में मात्र तमाशा बन कर रह गया. लगता है हम वैश्विक स्तर पर न्यायवान होते हुए भी क्षमाशील दिखाए दिए! मुझे क्षेत्रीय श्रम संस्थान,कानपूर से औद्योगिक सुरक्षा ( Industrial Safety) में Post Diploma करने का अवसर मिला वहां मुझको विश्व प्रसिद्ध दुर्घटनाओ के बारे में पढ़ने का एवं तकनीकी रूप से दुर्घटनाओ के कारणों के बारे में जानने का अवसर मिला जिसमें भोपाल गैस त्रासदी भी एक थी. विभिन्न पुस्तकों, लेखों, पत्रों, शोधों की जानकारियों के अनुसार जो कारन सामने आये उनके अनुसार "दुर्घटनाएं घटित नहीं होती ,अपितु कारणीभूत होती हैं" भोपाल गैस त्रासदी के भी अनेक कारण हो सकतें हैं, परन्तु प्रारंभिक तौर पर मुझे जो कारण समझ में आये वो एस प्रकार हैं -
मानवीय भूल
उपकरणों का ख़राब होना
ख़राब रख-रखाव
लापरवाही एवं दोषपूर्ण संचालन
दोषपूर्ण संरचना आदि है.
असल में भोपाल का यूनियन कार्बाईड सयंत्र वर्ष १९३४ में स्थापित किया गया था, तब वह शहर से एकदम बाहर था. वर्ष१९७०के आसपास कारखाने में पेस्टीसाईड़ इकाई लगे गयी. तब तक कारखाने के आसपास बसाहट बढ़ने लगी थी परन्तु उसे नज़रंदाज़ किया गया. वर्ष १९८४ कारखाने का स्वर्ण जयंती वर्ष था,किसको पता था की ड्राकुला बनकर हजारों लोगो का खून पीकर यह सयंत्र अपनी स्वर्ण जयंती मनायेगा. भोपाल सयंत्र में "कार्बरिल " नामक कीटनाशक बनाया जाता था. आज हम उसे मानव नाशक कह सकते है. सयंत्र में "कार्बरिल " पयरोलिसिस क्रिया द्वारा बनाया जाता था, जिसमे मोनो मिथाईल अमीनऔर फास्जीन गैस की क्रिया कराने से मिथाईल आईसो साइनेट (एम्. आई. सी.) अंतर मध्यीय उत्पाद के रूप में बनती है, जो गैस और द्रव दोनों अवस्थाओं में अत्यंत विषैली,पानी के साथ अत्यंत क्रियाशील होती है.
एम्. आई. सी को
सयंत्र में उसे बड़ी -बड़ी टंकियो जिसे हम वहां बुलेट कहते है, भरकर राखी जाती थी. मिथाईल आईसो साइनेट की अल्फ़ा नेफ्थाल से क्रिया कराकर अंतिम उत्पाद कार्बरिल बनता है.दुर्घटना वाली रात, सयंत्र में साठ टन के तीन बुलेट भरे हुए थे. दुर्घटना वाली रात, अर्थात दो दिसंबर को सयंत्र में उत्पादन कार्य बंद था और अनुरक्षण कार्य किया जा रहा था. रात्रि लगभग सवा दस बजे कार्य पर उपस्थित पाली पर्यवेक्षक द्वारा ऑपरेटर से टेंक नंबर ६१० की पाईप लाइन धोने को कहा.रात्रि कालीन नए ऑपरेटर ने लगभग ग्यारह बजे अपनी आँखों में जलन महसूस की, परन्तु उसने इसे यह सोचकर नज़रंदाज़ किया की इस तरह की जलन होना आम बात थी. उसने मध्य रात्रि यह पाया की टेंक में ताप दाब दोनों लगातार बढ़ रहे है. उसने यह सोचा कि हो सकता है शायद ताप -दाब मापी घडी का कांटा सही नाप नहीं बता रहा है,अतः उसने इसे हल्क़े में लिया. लगातार बढ़ते ताप दाब के कारण रप्चर डिस्क फट गई और सेफ्टी वाल्व उड़ गया तथा रनवे रिएक्शन प्रारंभ हो गया. रनवे रिएक्शन की यह खास बात है की वह एक बार यदि प्रारंभ हो जय तो उसे रोकना अत्यंत कठिन कार्य है. उक्त टेंक में भरी मिथाईल आईसो साइनेट (एम्. आई. सी.) अर्थात " मिक " गैस दिसंबर की कडकडाती ठण्ड में ३३ मी. ऊँची मीनार से भोपाल शहर की हवा में फ़ैल गई. दुर्भाग्य से उस दिन हवा का रूख शहर की तरफ ही था. उसके बाद तो जो हुआ वो सभी ने देखा, जाना और आज भी जान रहे है. भोपाल का नाम हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो में भयानक औद्योगिक त्रासदी के लिए अमर हो गया.
अब हम इसे मानवीय भूल कहें या दोषयुक्त कार्य प्रणाली, क्योंकि पाईप में पानी पड़ने पर टेंक के अन्दर जाना और लगातार ताप-दाब में वृद्धि को नज़र अंदाज़ करना समझ में नहीं आता . दूसरा कारखाने में लगाये गए पांचो सेफ्टी सिस्टम जिसमें,
. वेंट गैस स्क्रबर
. फ्लेयर स्टेक टावर
. वाटर कर्टेन
. रेफ्रिजरेशन सिस्टम
. स्पेयर स्टोरेज टेंक

होने के बावजूद अपनी कसौटी पर खरे नहीं उतरे. विभिन्न रिपोर्टों एवं जानकारी के अनुसार - स्क्रबर में कास्टिक सोडे द्वारा गैस को प्रभावहीन बनाया जाता था, परन्तु दुर्घटना के समय स्क्रबर सुधार कार्य में था. फ्लेयरस्टेकटावर में स्वचालित रूप से विषैली गैसों को हवा में जलाने का कार्य किया जाता था परन्तु दुर्घटना के समय इस टावर की पाईप लाइन में सुधार कार्य किया जा रहा था. वाटरकर्टेन यह वह पद्धति है जिसमें संवेदनशील क्षेत्रों में पानी के फौव्वारों द्वारा हवा में विसरित गैसों(यहाँ मिक ) को पानी में घोलकर डाई मिथाईल यूरिया अथवा ट्राई मिथाईल ब्युरेट बनाया जाता था परन्तु दुर्घटना के समय पानी के फौव्वारे चालू होने के बावजूद तीस मीटर की ऊँचाई तक पहुँच नहीं सके. रेफ्रिजरेशन सिस्टम, जो टेंक के अन्दर -१० से -१५ डिगरी सेंटीग्रेड तक के तापमान को बनाये रखने के लिए तीस टन क्षमता का रेफ्रिजरेशन सिस्टम डिज़ाइन किया गया था परन्तु दुर्घटना के समय वह चालू नहीं किया गया था. स्पेयर स्टोरेज टेंक, यह, "मिक" के भण्डारण के लिए साठ टन के तीन अतिरिक्त टेंकों की व्यवस्था की गयी थी परन्तु दुर्भाग्य से उस दिन उसमेंसे एक भी टेंक खली नहीं था. जब टेंक ६१० में दाब बढ़ा तो उसे दूसरे टेंक में स्थानांतरित किया जा सकता था. अब इसे लापरवाही कहें या दुर्भाग्य की घटना के समय वो सभी पहले से ही भरे हुए थे. यहाँ यह कहना सर्वथा उचित होगा की गैस थी इसलिए तो रिसी, नहीं होती तो क्यों रिसती. यह जानने के बाद मेरे दिमाग में क्या कोई भी सामान्य आदमी के दिमाग में प्रश्न उठाते है जैसे - जब कारखाने में उत्पादन कार्य बंद था तो १८० टन मिक गैस का भण्डारण उचित था? उसका अंतिम उत्पाद कार्बरिल क्यों नहीं बनाया गया ? क्या कारखाने वाले सभी मिक की तासीर से अनभिज्ञ थे?
ऐसा नहीं है कि कारखाना प्रबंधन और सरकार दोनों अच्छी तरह से कारखाने के बारे में नहीं जानते थे. भोपाल हादसे से पहले स्थानीय पत्रकारों द्वारा कई बार स्थानीय समाचार पत्रों में कारखाने सम्बन्धी प्रश्न उठाये गए थे परन्तु ऐसा लगता है जैसे उसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया अन्यथा यह दिन नहीं देखना पड़ता. प्राप्त जानकारी के अनुसार सन १९७५ तक कारखाने के चारों और काफी बसाहट हो चुकी थी. उस समय तत्कालीन भोपाल प्रशासक द्वारा कारखाने को कही अन्यत्र स्थानांतरित करने हेतु प्रयास किया था, परन्तु वे यशस्वी नहीं हो सके. सन १९८२ के लगभग कारखाने को लेकर में मध्यप्रदेश विधानसभा में भी प्रश्न उठाया गया. सरकार की तरफ से तत्कालीन श्रम मंत्री द्वारा इसका जवाब विधानसभा में दिया था और बताया गया था की कारखानें में सफेटी सम्बन्धी पूरी व्यवस्था है. कारखाने को कहीं अन्यत्र ले जाना कोई हंसी खेल नहीं है और भोपाल को कोई खतरा नहीं है. कारखाने को कहीं अन्यत्र ले जाना कोई हंसी खेल नहीं है और भोपाल को कोई खतरा नहीं है. ऐसे में यह बात तो सर मुंडाते ही ओले पड़े जैसी हुई. ऐसे में आज इस हादसे ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है की हमने इससे क्या सीखा ?
.सभी देशों के नागरिकों की जिंदगी को समान रूप से आंकना चाहिए. जबकि होता यह है कि विकसित देश, विकासशील देशों के नागरिकों को दुह्यम दर्जे के रूप में आंकते है. हम भारतीयों की जिंदगी तो सस्ती, सुन्दर और टिकाऊ समझी जाती है.
. विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में समान उपकरण और समान ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं लगाये जाते, जबकि उसमें एकरूपता होनी चाहिए.
. विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में कारखाने की कार्यप्रणाली एवं सम्बंधित खतरों को समय -समय पर अवगत कराया जाना चाहिए.
. विकसित देशों द्वारा जब विकासशील देशों में कारखाने लगाये जाते हैं तो उनकी जवाबदेही अधिक होनी चाहिए. भोपाल के केस में तो यूनियन कार्बाईड ने अपना पल्ला बड़ी खूबसूरती से झाड़ लिया.
. स्टाफ एवं कर्मचारियों को समय-समय पर सेफ्टी सम्बन्धी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए.
. विकसित देशों में एम.आई.सी. का भण्डारण बड़े-बड़े ड्रमों में किया जाता है तत्पश्चात उसे अलग भवन में रखा जाता है जिसके ऊपर स्वचालित फौव्वारों द्वारा पानी का छिडकाव किया जाता है तथा उसमें गैस डिटेक्टर लगे होते हैं.
.भोपाल हादसे के बाद फ़्रांस द्वारा उनके यहाँ एम.आई.सी. का आयत बंद कर दिया था.
. कारखानों के आसपास के लोगो को खतरों और आपातस्थिति के बारे में जानकारी एवं प्रशिक्षण देना चाहिए. जो भोपाल के केस में नहीं दिया गया था.
. जनमानस को आग लगने का सायरन एवं गैस रिसने का सायरन अलग-अलग है इसके बारे में जानकारी देनी चाहिए. जो भोपाल के केस में नहीं दिया गया था.