भारत में औद्योगिक विकास तो हुआ है पर उसके साथ उद्योगों में खतरे भी बढे है, परन्तु औद्योगिक सुरक्षा को विशेष महत्व नहीं दिया गया फलस्वरूप दुर्घटनाएं जरी है. भोपाल गैस त्रासदी ऐसे ही लापरवाही की जीती जगती मिसाल है. सन 1974 में फ्लिक्सबरो (यु.के.) एवं सन 1976 में इटली में हुई दुर्घटनाओं ने यूरोपीय समुदाय की आँखें खोल दी, परिणाम "सीमा "(CIMAH) अर्थात Control of Industrial Major Accident Hazard रूल्स का बनना. हमारे यहाँ भोपाल गैस त्रासदी के बाद सन 1987 में कारखाना अधिनियम में संशोधन हुवे और चेप्टर 4A हेजार्डस प्रोसेस, सेक्शन (41A-41H ) का समावेश किया गया और अन्य संशोधन भी किये गए पर लगता है पर अनुपालन के हिसाब से वे मात्र औपचारिकता ही हैं ,जो दूसरे भोपाल जैसे त्रासदी को जन्म दे सकते है!वर्तमान में कारखाना अधिनियम में अधिभोगी( Occupaier )और कारखाना प्रबंधक को दोषी पाए जाने पर सेक्शन 92 के अंतर्गत अधिकतम दो वर्षों तक एवं एक लाख रुपये तक के जुर्माने तक का प्रावधान है, परंयु आज के परिप्रेक्ष में यह दोनों महज गौण है या केवल छोटे उद्यमियों के लिए ही है ऐसा जान पड़ता है. एंडरसन जैसे रसूखदार लोग जो रूपयों की और सत्ता की ताकत से बच जाते है या फिर उनके देश भगा दिए जातें है और सामान्य जनमानस न्याय से वंचित रह जाता है या फिर अपने आप को छला महसूस करता है. ऐसे में, मेरे विचारों में जनता जनार्दन ही इसकी जिम्मेदारी तय करके मिडिया के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाकर लोगों को न्याय दिलवाने में मदद कर सकती है, ताकि हमारा भविष्य सुरक्षित हो सके अन्यथा वे हमारे लचीले कानून से सदा बच जाते रहेंगे . विदेशी कंपनियों का सोचना होगा की भारत में कारखाना लगाने और उसे चलाने की लागत से भी सस्ती वहां की जान है तो करो प्रयोग भारत की धरती पर. सारे विश्व में भारत का यह सन्देश जायगा वहां के लोग क्या लोग क्या सरकार भी कुछ नहीं कर सकती. यह एह विचारणीय प्रश्न होगा.
(नितिन देसाई, जबलपुर.)
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