सुमन की सुगंध चारों ओर विसरित होती है किन्तु वह दिखाई नहीं देती.बाग,बगीचे,वन,उपवन,ताल,तलैय्या,नदी,पहाड़,हरियाली सबपर्यावरण के साथी है.इनकी सुरक्षा करना मानव जाती का नैतिक दायित्व है.निसर्ग हमें बारम्बार चेतावनी देता है कितु हम उसे नज़रंदाज़ करते है.आज पर्यावरण के मित्र कम और शत्रु अधिक हो गये है.जिसका दंड भोगना निश्चित है.तो आइये आज से ही हम उसे बचाने का संकल्प लेकर उसके शुभचिंतक और "मित्र" बनकर उसे प्रदूषण से मुक्त कराने में अपना योगदान दे.
Sunday, July 11, 2010
अब लौकी बेचारी क्या करे !
कुछ (एक-दो) दिन पहले मैंने एक निजी चैनल पर समाचार देखा कि एक वैज्ञानिक की लौकी के जूस पीने से मौत हो गई,और उनकी पत्नी की हालत गंभीर थी तथा उनका इलाज चल रहा था.सुनकर ख़राब लगा. सर्वप्रथम मै पीड़ित परिवार के प्रति सहानूभूति व्यक्त करता हूँ और परमपिता परमेश्वर से उनकी आत्मा की शांति हेतु प्रार्थना करता हूँ.खबर वाकई विचलित कर देने वाली थी,पर अब बिचारी लौकी का क्या दोष! जो लोग एकदम उसके पीछे ही पड़ गये.असल हमारे किसानो को हरित क्रांति के बादसे पैदावार बढाने का चस्का जो लग गया है, वो खेतों में रासायनिक खाद,कीड़ों को मारने हेतु जहरीली दवाओं का छिडकाव करते है तथा साइज़ बढाने के चक्कर में इंजेक्शन भी लगाते है. लौकी बेचारी तो एकदम भोंदू की तरह है उसमें उत्तम गुण होते हुए भी बरसों से मरीजों के सिवाय उसको कोई नहीं पूछता था.यदि कोई डिब्बे में लौकी की सब्जी लाये तो उसे यह सुनने को मिलता था की यह तो मरीजों का खाना है.पनीर-शनीर क्यों नहीं लाये? सब उसकी खिल्ली उड़ाते थे.यह तो बाबा रामदेव की कृपा है,जिसने उसको सबका चहेता बना दिया, और उसका मान भी बढ़वा दिया,वरना जब वैद्यराज जी लौकी खाने को कहते तो अच्छे-अच्छे लोग नाक-भों सिकोड़ने लगते कि कब इससे पिंड छूटेगा,लेकिन अब तो पिंडदान के समय भी लौकी को बाजू में रखने कि नौबत आ गई है!गुणधर्म में तो लौकी पहले जैसी थी वैसे आज भी है परन्तु अब तो वो लोगों की इतनी प्यारी हो गई है कि पार्टियों में हलुए के रूप में भी दिखाई देती है,मधुमेह वाला भी इसे बड़े चाव से खाता है तथा बाद में बाबा रामदेव कि जय बोलकर एक टेबलेट भी खा लेता है.इस ससुरी चटोरी जीभ ने उसकी कीमत जो बढ़ा दी है.यह जीभ या तो कैची कि तरह चलेगी या फिर चटोरों का साथ देगी.आज अधिकतर लोगो को मधुमेह से पीड़ित कराने में इस चटोरी जीभ का बहुत बड़ा योगदान है, जो नित नये व्यंजनों को चखने में बेकाबू हो जाती है और परिणाम मनुष्य को भोगना पड़ता है.मनुष्य है जो खाने पर नियंत्रण रखने को तैयार नहीं,चाहे फिर गोली क्यों न खानी पड़े.सर में दर्द पर दर्द निवारक गोली खायेगा,एसिडिटी बढ़ने पर एंटासिड खायेगा पर बुद्धिजीवी होने के नाते यह विचार नहीं करेगा कि सर दर्द क्यों? एसिडिटी क्यों?अपने शास्त्रों में कहा गया है कि ज्यादा आम खाने पर चार जामुन खाले,ज्यादा जामुन खाने पर एक आम खाले, असल में आम मीठा होता है और अम्लता निर्माण करता है तथा जामुन कसैला होता है वो आम के अफरे को दूर करता है.कहने का तात्पर्य यह है कि सिस्टम को प्राकृतिक रूप से बेलेंस करें.एक और कहावत है कि क्वांर,कार्तिक,करेला दही,मरो नहीं,तो पड़ो सही.सैकड़ो वर्षों पूर्व लिखी गई ये पंक्तियाँ एकदम सटीक है,परन्तु आदमी है की मनाता ही नहीं.उसकी जीभ उसे ललचाये रहती है.वैसे किसी भी फल का ताज़ा रस फायदा करता है, निकलकर देर तक रखा हुआ नहीं.शास्त्र के अनुसार कड़वा रस रेचक का कार्य करता है,जो पेट साफ करने में सहायक होता है.अतःकिसी भी फल का रस पीने के पूर्व उसके कडवेपन की जाँच अवश्य कर लेना चाहिये अन्यथा परिणाम हम देख चुके है.बरसों पहले ऐसी ही एक घटना मेरे एक मित्र के साथ घट चुकी है. भाई साहब बाबा रामदेव के नियमित प्रवचन सुना करते थे.वे उनसे प्रभावित थे.उन्होंने लौकी के रस का नियमित सेवन करना प्रारम्भ कर दिया था.एक दिन राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर उन्हें झंडा वंदन को जाना था. भाई साहब ने लौकी का रस निकाला और रख दिया. फिर वे झंडा वंदन के लिए चले गये. वहां से आकर उन्होंने रस पिया और फिर दूसरे कार्यक्रम के निकालने वाले थे कि एकाएक पेट में गड़बड़ शुरू हो गई. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया.उनसे पूछने पर पता चला कि जल्दबाजी में उन्होंने खाली पेट लौकी का रस पिया था,जो कि कडवा था.खैर भाई साहब तो बच गये पर कड़वी लौकी हमेशा के लिये असर कर गई.मुझे वह कहावत याद आती है, "अब पछतावत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत." बहन लौकी हमें सीख देती है कि पहले अपनी तासीर को समझो फिर उपयोग किये जाने वाले पदार्थ के गुणधर्म को समझो तत्पश्चात ही उसे अपनाओ अन्यथा परिणाम गंभीर होंगे?जिसे बाबा ने हीरो बनाया उसे हम नासमझी में जीरो बनाने पर तुले है. तभी तो बेचारी लौकी कहने को मजबूर है कि गरीब कि लुगाई, सब कि भौजाई. मेरा क्या कसूर? मै क्या करूं.आप स्वयं ही सुधर जाइये!
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

लौकी बेचारी का क्या कसूर
ReplyDeleteबेचारी लौकी...
ReplyDeleteहाँ सही बात है. लौकी का क्या कसूर. हमारे यहाँ तो आये दिन लौकी ही बनती है.
ReplyDeleteकडवी लौकी वाकई इतनी कडवी होती है कि आप उसे केवल चख लें तो लौकी देखकर डर लगने लगेगा.
ReplyDeleteऎसी एक लौकी घर में आयी थी और बिना चखे ही हमने लौकी की पकौड़ी, कोफ्ते की सब्जी बनायी थी लेकिन पहली बार पता लगा कि लौकी नीम और करेले से भी कडवी हो सकती है. हमें तो सब कुछ फैकना पड़ा था, तब मीडिया वाले किसके पीछे पड़ते क्योंकि तब बाबा रामदेव जी मीडिया-मंडित नहीं थे.
वाह रे लौकी. लेखवा का मेहनत लौकाई दे रहा है.
ReplyDeleteइस नए और सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
ReplyDeletevery nice article
ReplyDeleteआपका ब्लाग जगत में स्वागत है।
ReplyDeleteनियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
पढिए एक प्रेम कहानी
तलाश जिन्दा लोगों की ! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!
ReplyDeleteकाले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=
सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।
ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।
इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।
अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।
आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-
सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?
जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
महज एक लौकी जान ले सकती है तो बेचारी कैसे हुई ...
ReplyDeleteयह बात योग करने वाले गुरूओं को भी बताई जाए
ReplyDeleteजूस पीने की सलाह देते रहते हैं.
अच्छी जानकारी दी आपने.