सुमन की सुगंध चारों ओर विसरित होती है किन्तु वह दिखाई नहीं देती.बाग,बगीचे,वन,उपवन,ताल,तलैय्या,नदी,पहाड़,हरियाली सबपर्यावरण के साथी है.इनकी सुरक्षा करना मानव जाती का नैतिक दायित्व है.निसर्ग हमें बारम्बार चेतावनी देता है कितु हम उसे नज़रंदाज़ करते है.आज पर्यावरण के मित्र कम और शत्रु अधिक हो गये है.जिसका दंड भोगना निश्चित है.तो आइये आज से ही हम उसे बचाने का संकल्प लेकर उसके शुभचिंतक और "मित्र" बनकर उसे प्रदूषण से मुक्त कराने में अपना योगदान दे.
Sunday, September 12, 2010
Wednesday, September 8, 2010
शिक्षक सम्मान की हकीकत
पांच सितम्बर को शिक्षक दिवस था. हम सभी जानते है कि भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्मदिवस को हम शिक्षक दिवस के रूप में मनाते है.उस दिन मै सुबह -सुबह समाचार पत्र पढ़ रहा था. समाचार पत्र में शिक्षक दिवस के समाचार सुर्ख़ियों में थे. एक समाचार था, शिक्षक दिवस शिक्षकों का सम्मान होगा,दूसरा समाचार था,दो शिक्षकों पर लटकी निलंबन की तलवार, तीसरा समाचार था,देश में बारह लाख शिक्षकों की कमी, चौथा, म.प्र.के शिवपुरी जिले के बैराड़ थाना अंतर्गत खरई डाबर गाँव में वेतन न मिलने से दो शिक्षकों ने आत्महत्या की,... आदि यह सब पढ़कर मेरा दिमाग भन्नाया कि ऐसा क्यों हो रहा है? कहीं मै पीपली लाइव तो नहीं देख रहा!समाचारों में एक समाचार सकारात्मक था,बाकि के सब नकारात्मक थे. कहीं हमारी शिक्षा पद्धति नकारात्मक दिशा में तो नहीं जा रही है?
वास्तव में शिक्षक का मूल उद्देश्य शिक्षा देना है न की अर्थार्जन करना,परन्तु बदलते परिवेश में शिक्षक को भी अपना परिवार चलाना है.यदि उसकी मूलभूत सुविधाओं का ध्यान नहीं रखा जाय तो शिक्षक की शिक्षण पद्धति में असर तो पड़ेगा ही.कहते है "भूखे पेट भजन न होई गोपाला ." वैसे ही पूरी पगार न मिलने और अपना कार्य करने के लिए शिक्षकों को अफसरों के चक्कर काटने पड़ते है, आवश्यकता पड़ने पर चढ़ोतरी भी चढ़ानी पड़ती है, इसके अतिरिक्त अनेकों ऐसे कार्य है,मसलन टीकाकरण, जनगणना, पल्स पोलिओ दवा पिलाना, चुनाव, मतगणना... आदि तो ऐसे हम उनसे क्या अपेक्षा रख सकते है.आजकल अधिकांश शिक्षक ऐसे है जिन्हें अपने कार्य से संतोष नहीं है, उनका मन हीन भावना से ग्रस्त रहता है, वे अपने को जीवन भर कोसते रहते है, वे किसी मजबूरी के तहत शिक्षक के पेशे को अपनाये रहते है.ऐसे में उनसे गुणवत्ता की उम्मीद करना बेमानी होगी, आखिरकार वे भी इन्सान है. इन सब विसंगतियों के बावज़ूद "शिक्षक" यह पद सम्माननीय है.वह समाज में दिखाई देने वाले कंगूरों के नीव का पत्थर है. वह एक कुम्हार की तरह है जो अपने विद्यार्थीयों को एक आकार प्रदान करता है,फिर चाहे वो सहायक शिक्षक हो, चाहे प्राध्यापक, चाहे संविदा शिक्षक या फिर गुरूजी, ये सभी चरित्र निर्माण की भूमिका अदा करते है, जो समाज के उत्थान या पतन का करक बनता है.. आधुनिकता के चलते शिक्षक दिवस मनाने का तरीका बदल गया है,जैसे वो ग्रीटिंग देकर हो या पुष्प गुच्छ देकर पर उसका मूल आधार तो शिक्षकों का सम्मान करना है,और उनके पद को नमन करना है.कहते है न,चित्रपट समाज का आइना होता है तो फिल्मवालों ने भी शिक्षक के विभिन्न रूपों को अपने परदे पर उतारा है. कुछ फिल्मो में उसे गंभीर,अनुशासनप्रिय और कहीं मसखरा दिखया है.मुझे कुछ फिल्मे याद है जैसे जाग्रति,परिचय, चुपके-चुपके, कस्मे-वादे,मोहब्बतें, मेजरसाब,ब्लेक,बुलंदी,तारे जमीं पर,थ्री इडियट्स.. आदि. इसके अलावा १९७२ में अनंत माने की मार्मिक कहानी को वी. शांताराम ने निर्देशित किया,शंकर पाटिल के संवाद और जगदीश खेबुडकर के गीतों को राम कदम ने संगीत में ढाला है,मराठी का बड़ा ही प्रसिद्ध चित्रपट पिंजरा है,जिसमे श्रीराम लागू ने एक आदर्शवादी शिक्षक की तो संध्या ने तमाशबीन और नीलु फुले ने खलनायक की भूमिका अदा की है.आदर्शवादी शिक्षक गाँव में तमाशा आने का विरोध करता है और बच्चों,बड़ों को तमाशा देखने से मना करता है. तमाशबीन संध्या उसे खुली चुनौती देती है कि वह उससे डपली बजवा कर रहेगी.परिस्थितियां ऐसी बनती है कि आदर्शवादी शिक्षक तमाशबीन महिला के चक्कर आ जाता है.मन ही मन उसे आत्मग्लानी होती है पर वह मजबूर होता है. गाँव में एक हत्या होती है. परिस्थितिवश शिक्षक अपने कपडे लाश को और लाश के कपडे खुद पहन लेता है और तमाशबीनो की टोली में शामिल हो जाता है.गाँव में में यह प्रचारित हो जाता है कि शिक्षक मर गया. उसके आदर्शवादिता के कारण गाँव में उसकी मूर्ती स्थापित कर उसे सम्मानित किया जाता है. उधर शिक्षक तमाशबीनो की टोली में डपली बजाता है. खाने के समय एक कुत्ता शिक्षक के बाजू में आकर बैठता है और रोटी खाता है.शिक्षक पानी पानी हो जाता है. बाद में पुलिस आकर परिवर्तित शिक्षक को शिक्षक की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार करती है.कहने का अर्थ यह है की शिक्षक के आदर्श मरणोपरांत भी जीवित रहते है.हाथ की जैसे पांचो उँगलियाँ बराबर नहीं होती वैसे सबसे एक जैसा होने को उम्मीद रखना भी बेमानी है.हमारे यहाँ शिक्षक अर्थात गुरु अर्थात अंधकार को दूर कर प्रकाशवान बनाने वाला व्यक्तित्व है. इसलिए कहा गया है - " गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लगौ पाय, बलिहारी गुरु आपनी गोविन्द दियो बताय. " परन्तु आजकल के विद्यार्थी, लडके अपने शिक्षक से इस दोहे को इस प्रकार से कहते और उम्मीद रखते है " गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लगौ पाय, बलिहारी गुरु आपनी नंबर दियो बढ़ाय."
Saturday, September 4, 2010
आखिर कब तक.....: पुस्तक के बारे में...
आखिर कब तक.....: पुस्तक के बारे में...: " प्रातःकाल की बेला थी,प्राची से रश्मि का उदय,सुबह-सुबह मैं बालकनी में बैठा भुवन भास्कर को निहार रहा था कि एकएक मुझे मेरे चहेत..."
रवि की रश्मियाँ: जिज्ञासा
रवि की रश्मियाँ: जिज्ञासा: "पतझड़ की एक संध्या में, बीहड़ में से एक मुसाफिर चला जा रहा था, पैरों तले रोंदते हुए पत्तों को, चरमराते हुए पत्ते ने प्रश्न पूछा, कौ..."
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