मुझे, विगत वर्ष पितृपक्ष में बरसी कार्यक्रम हेतु जाना था. मै तैयार होकर रेलवे स्टेशन पहुँचा स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि एकाएक मेरे दो पर्यावरण मित्र श्री विजय शर्मा और श्री सुनील यादव जी दिखाई पड़े.मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई कि चलो.. मित्रों के साथ यात्रा का मजा अलग ही होगा. मैंने पूछा कहाँ का कार्यक्रम है?उन्होंने बताया चारों ओर प्रदूषण बढ़ रहा है इसलिए पर्यावरण परिसर, भोपाल, एक ज्ञापन देने जा रहे है. मैंने सोचा चलो इसी तरह समाज में धीरे-धीरे जाग्रति आएगी.वैसे भी आजकल सभी ज्ञात प्रदूषणों के आलावा टी.वी. चैनल्स पर अधिकांश सीरियल्स/ धारावाहिकों द्वारा अत्यधिक मानसिक प्रदूषण फैलाया जा रहा है और उस पर किसी का कोई अंकुश नहीं है.”सी” “रियल्स” अर्थात सच्चाई दिखाना. वे मुद्दा रियल उठाते है और काल्पनिक रूप से आर्टिफिशियल जामा पहना कर इतना लम्बा खीचते है कि उससे सुगन्धित और प्रफुल्लित वातावरण होने के बजाय प्रदूषित और बदबूदार वातावरण निर्मित हो रहा है. एक बार भीड़ होने पर रेलवे वाले अतिरिक्त कोच लगाने से परहेज कर सकते है पर आजकल सीरियल्स के अधिकतर निर्माता निर्देशक उसकी कड़ियाँ ऐसे बढ़ाते है जैसे कि हनुमान जी की पूँछ हो. इस पर सुनील जी कुछ कहने ही वाले थे कि रेल प्लेटफ़ॉर्म पर आ गई. हम लोग कोच में बैठ गए. रेल अपनी गति से चल रही थी.कुछ लोग बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे,कुछ पेपर/मैगज़ीन पढ़ रहे थे,कुछ मूंगफली/चिप्स खा रहे थे… इतने में इलायची वाली चाय….गरम चाय की आवाज आयी तो दूसरे तरफ से खीरा लो खीरा.. ताज़ा खीरा की आवाज़ आयी.इन सब के बीच बाजूवाले डिब्बे से बड़ा ही मधुर स्वर सुनाई दे रहा था परन्तु दूरी के कारण बोल स्पष्ट सुनाई नहीं दे रहे थे. हम लोग अपनी बातों में व्यस्त थे कि देखा गाने वाली टोली जिसमे १३-१४ साल के दो लडके और एक लड़की,जो, मैले कुचैले से कपडे पहने हुए थे, ने डिब्बे में प्रवेश किया और लड़की ने गाना चालू किया. एक लडके के हाथ में रंग के डिब्बे से बनाया हुआ गिटार था, तो दूसरे के हाथ में एस्बेस्टस की टूटी हुई चिप्पियाँ थी, जिसे उसने अपने दोनों हाथों में बड़ी खूबसूरती से फंसा रखा था, बजा रहा था.पास आने पर गाना एकदम साफ़ सुनाई दिया. गाने के बोल थे ” जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते है लोग, एक चहरे पर कई चहरे लगा लेते है लोग…. ” मैंने विजय से कहा गाना और उसका प्रस्तुतीकरण तो समाज के मुखौटों पर तमाचा है. विजय भाई आपने भी तो अपने व्यंग में कुछ इसी तरह से कहा है ज़रा सुनाइये, सफ़र भी कट जाएगा और मनोरंजन भी. इस पर विजय भाई ने बताना शुरू किया.. वर्तमान समय,समाज में दो तरह के मुखौटे लगाये हुए लोगो का है. एक समाज की व्यवस्था से संघर्ष कर रहा है तो दूसरा अपने आप को समाज में स्थापित करने हेतु अवैध तरीका अपनाकर घुन की तरह लगा हुआ है. उसे न समाज से मतलब है न संस्था से और देश से तो बिलकुल नहीं.वह आत्मस्तुति में लगा है. वह छपवास और बकवास में लिप्त है और उस होड़ में अपने को बनाये रखने हेतु कोई कसर नहीं छोड़ता.उनके दांत हाथी के होते है जो खाने के अलग और दिखाने के अलग. जो भी कल्याणकारी योजनायें आती है उसका ज्यादातर लाभ ये लोग लेकर सारा क्रेडिट खुद ले लेते है. ऐसे लोग दूधों नहाये और पूतों फले इस हेतु स्वामी घुनानंद के मस्तिष्क में एक युक्ति आई, क्यों न ऐसी दिव्य औषधि बनाई जाय जिससे सभी का कल्याण हो सके सभी उसे पाकर धन्य महसूस करे. इस विचार धारा से प्रेरित होकर स्वामी घुनानंद ने विचार किया किया कि कोई ऐसी तेल रूप औषधि बनाई जाय जिससे अधिक से अधिक लाभ मिल सके. जिसके लेपन से मानसिक और शारीरिक और पंगुता जैसी सारी व्याधियां दूर हो जाय तथा लोलुपता वाली ताज़गी का अहसास हो. दुनिया भर के सारे कार्य आसानी से हो जाय तथा सांप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे. इसी मंथन में स्वामी घुनानंद अपने अनुसन्धान में लग गए. इस हेतु उन्होंने संसार भर के सारे सरकारी, गैर सरकारी कार्यालयों,ब्लाक, तहसीलों, पंचायतों, विद्यालयों, शिक्षा के मंदिरों,मंत्रालयों,कारखानों,खेतों,राजनैतिक ईकाईयो, पुलिस, उद्योग, कर वसूली विभागों, सहकारी संस्थाओं, वित्तीय/गैर वित्तीय संस्थाओं.. आदि से होते हुए जंगलों में घोर तपस्या कर के उत्तम गुणवत्ता वाली जड़ी बूटियों जिसमे महिमामंडन, रिश्वतखोरी,गुणगान,चमचागिरी,नियमों विरुद्ध कार्य,सत्य का गलाघोटना, लेटलतीफी,अवसरवादिता,घर पहुंच सेवा… इत्यादी मिलाकर इनके सत्व को बड़े जतन से धैर्यपूर्वक निकालकर एक तरल पदार्थ का निर्माण किया जिसका नाम उन्होंने ” घुनानंद का तेल ” रखा.अब उसको बाज़ार में लाकर बिक्री करना था तो आचार्य घुनानंद ने मुहूर्त के बारे में सोचना शुरू किया. इस हेतु उन्होंने बड़े बड़े पंडितों, ज्योतिषाचार्यों, टी वी पर आने वाले भविष्य वेधत्ताओं आदि से संपर्क किया और जनमानस में लाने हेतु उत्कृष्ट मुहूर्त का चयन किया. घुनानंद जी ने विपणन कंपनियों से संपर्क करके उसका विज्ञापन तैयार किया जिसमे सभी विवादस्पद कलाकारों ने बिना किसी हिचक के और सार्वजनिक हित में उसका विज्ञापन दिया और बड़े जोर से कहा कि मूल्यवान,चमत्कारी,गुणकारी,असरकारी और ९८% लाभकारी सफलता दिलाने वाला घुनानंद का तेल औषधि रूप है और इसे प्रत्येक परिवार का मुखिया, स्त्री, पुरुष यहाँ तक की बच्चे विशेष दर पर प्राप्त कर सकते है. स्वामी जी ने बड़े जातां से इसे पाउच से लेकर बड़ी पैकिंग में उपलब्ध कराया है और इसकी विश्वसनीयता हेतु इस पर पर्ची चिपकाई है जिसका विवरण इस प्रकार है.
स्वामी घुनानंद जी महाराज,
घुनानंद मठ, सरकारी कुआ,
बाई का बगीचा, चिकना घड़ा,
हल्का प्रदेश.
स्वामी जी का आव्हान था अब तो समाज को बिलकुल मत छोडो और अपना नाम सार्थक करो तेल की तरह चिपको..घुनानंद की औषधि अपनाओ, सारी व्याधियां दूर भगाओ.घुनानंद जिंदाबाद.घुनानंद जिंदाबाद.
वाह! विजय भाई, अपने तो कमाल कर दिया पर अब ये बताओ कि मुझे यह औषधि कब मिलेगी ? सुनील जी ने कहा! इतने में एक स्टेशन आया और हम नीचे उतरे. गाने वाली टोली भी उतर कर गाने लगी“एक दिन बिक जायेगा माटी के मोल, जग में रह जायेंगे प्यारे तेरे बोल……” तथा अगले डिब्बे की ओर कूच कर गई और मस्तिष्क में एक विचार छोड़ गई.
मूल विचार श्री विजय शर्मा,”पर्यावरण मित्र” प्रस्तुतीकरण नितिन देसाई.

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