Thursday, June 3, 2010

“ “ अभी भी जल है सुलभ ,बचाओगे नहीं तो होगा दुर्लभ ”


"s मेरी रोज़ सुबह - सुबह चाय के चुस्कियों के साथ समाचार – पत्र पढने के आदत जो है. समाचार पत्र भी आजकल न्यूज़ को तदाका लगाकर सेंसेशनल बनाकार परोसना चाहते है ताकि लोगो को मसाले वाली चाय का आनंद मिले.
अचानक मेरी नज़र एक हेडिंग पर पड़ी “ सिंथेटिक ट्री “. मेरा दिमाग भन्नाया . अभी तक तो सिंथेटिक दूध, सिंथेटिक खोवा, सिंथेटिक कपड़ा . ये हो क्या रहा है. कही हम अपनी ओरिजेनिलिटी खोकर सिंथेटिक युग में तो प्रवेश नहीं कर रहे है. मैंने सोचा, ऐसा न हो किसी दिन सुबह - सुबह पढ़ने को मिले “सिंथेटिक आदमी ”…

असल में वैज्ञानिक ऐसे सिंथेटिक पेड़ तैयार करने में लगे है , जो वातावरण के असल पेड़ की तुलना में एक हज़ार गुना कार्बन डाय ओकसाइड अवशोषित करेंगे. वैज्ञानिको का एक दल इनके जरिये धरती के भीतर स्थित पानी से अवशोषण की तकनीक पर भी कम कर रहे है .
आज समूचा विश्व पानी की कमतरता से जूझ रहा है . संपूर्ण ब्रम्हांड में पृथ्वी ही एक मात्र ऐसा गृह है जहा जीवन की अनुकूलता के लिए उचित वातावरण है . अनादिकाल से ही “जल ” ही जीवो के जीवन का पर्याय रहा है . जीवो की सभी जैविक व रासायनिक क्रियाएं जल से ही संभव है जिसके परिणाम स्वरुप पृथ्वी पर पेड़ - पौधे पशु पक्षियों का मनुष्य जीवन के साथ सामंजस्य रहा है . तभी हम कहते नहीं संकोचाते की “जल ही जीवन है ”.वर्तमान में औद्योगीकरण , शहरीकरण और बाजारीकरण के फलस्वरूप जल का इतना अधिक दोहन हो चुका है की विश्व की अधिकांश आबादी जल जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के आभाव में जिंदगी काटने को मजबूर है . आज वैज्ञानिक भी “वाटर मिल “ के बारे में सोच रहे हैं .कनाडियन फर्म “एलिमेंट फोर ” के सी .ई .ओ . रिक हावर्ड का कहना है की हम हवा द्वारा शुदा ताज़ा पानी तैयार कर जल समस्या को हल कर सकते है और पानी की कीमत लगभग १.५० /- प्रति लीटर और औसतन ओपेरटिंग कॉस्ट रुपये १८ /- प्रतिदिन पड़ती है .तीन फुट चौड़ी “वाटर मिल ” को घरों के बहार लगाया जा सकता है जहाँ नमीयुक्त हवा को फिल्टर के पशचात कुलिंग एलिमेंट से गुजरते है . जहाँ पर वह कंडेंस होकर पानी की बूंदों में परिवर्तित हो जाती है. जब हवा तेज़ हो तो ज्यादा पानी तैयार कर सकते है . मज़ेदार बात यह है की पृथ्वी के दो -तिहाई भाग में जल उपस्थित है परन्तु मात्र १% जल का प्रयोग हम पीने के पानी,सिचा औद्योगिक जरूरतों के लिए करते है .

मानव आवश्यकताओं के चार सामान ,

जल , भोजन , वस्त्र , और , मकान ..

पृथ्वी पर उपलब्ध पानी का 0.३% भाग पीने योग्य एवं शुद्ध है.जनसँख्या की दृष्टी से भारत का विश्व में दूसरा स्थान है जहाँ विश्व की लगभग १६ % जनसंख्या रहती है . यह कितनी विडम्बना की बात है की विशालकाय जनसंख्या वाले देश के लिए मात्र ४ % पानी ही उपलब्ध है .
भारत में जल की कमी के निम्नलिखित कारण है :-

१ अप्रभावी जल प्रबंधन

२ औद्योगीकरण एवं शहरीकरण

३ व्यवसायीकरण

४ भौतिकतावादी एवं विलासिता पूर्ण जीवन

५ स्वार्थी प्रवृत्ति

६ अत्यधिक दोहन

७ वृक्षों की कटाई

८ औसत वर्षा में कमी

९ तापमान में वृद्धि

१० अत्यधिक सिचाई

११ जल शिक्षा का आभाव

१२ जल जागरूकता का आभाव

१३ परंपरागत स्रोतों की सफाई न होना

१४ शासन की जल नीति का पूर्णरूपेण कार्यान्वयन न होना

१५ जल संचयन एवं संरक्षण में उदासीनता
इंटरगवर्नमेंटल पैनल ओन क्लाइमेट चेंज के आधार पर भारत की २०३० की तस्वीर इस प्रकार है.यदि भारत की आबादी इसी प्रकार से बढाती रही तो २०३० में अनुमानित प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता १००० क्यूबिक मीटर से कम हो जायगी,जबकि उसे १७०० क्यूबिक मीटर तक रहना चाहिए. वर्तमान में भारत में प्रति व्यक्ति न्यूनतम उपलब्धता लगभग १९०० क्यूबिक मीटर है लेकिन यह स्थिति भारत के सभी क्षेत्रों में नहीं है. पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति न्यूनतम १००० क्यूबिक मीटर जल की आवश्यकता होती है. इससे कम वाला क्षेत्र जलसंकट वाला क्षेत्र माना जाता है .
जल संरक्षण के उपाय :- आज के समय में यह कहनासर्वथा उचित होगा की
“ हम धरती से जल खीचते हैं निरंतर
अपनाएं ऐसी तकनीक की जल बढे जमीन के अन्दर ”.
जल की समस्या वयक्तिक नहीं है अपितु वैश्विक है . गिरते जल स्तर को सुधारने का उपाय है जल संचय .एक अनुमान के अनुसार ५० वर्ग मीटर की आकार की छत से एक वर्ष में लगभग ३३००० वर्ग लीटर
पानी एकत्र किया जा सकता है . इस जल से दो सदस्यों को पेय जल लगभग तीन माह उपलब्ध हो सकता है.
जल संरक्षण के प्रकार :-

१. व्यक्तिगत स्तर पर जल संरक्षण - आवश्यकतानुसार जल का उपयोग करें एवं व्यर्थ पानी बहने से रोकें. कपडे धोने के बाद गंदे पानी का उपयोग शौचालयों में करे.

२. खेती में जल संरक्षण - बूँद - बूँद सिचाई अथवा फौव्वारा सिचाई अपनाएं.

३. पारम्परिक जलस्रोतों का संरक्षण - पारम्परिक जल स्रोतों में समयबद्ध सफाई करवाये तथा उसमें फूल -मालायें , कचरा पौलीथीन, एवं गन्दगी न डालें . जल की शुद्धि हेतु दवएंया , फिटकरी इत्यादी योजनाबद्ध तरीकें से डाले .

४. वर्षा जल संरक्षण - आंकड़ो की माने तो भारत में सालाना औसतन ६०० मि.मि.वर्षा होती है इसका मतलब प्रति वर्ष देश में भू -सतह पर गिरने वाले चार हजार घन किमी जल का आधे से दो -तिहाई हिस्सा बेकारबहजाताहै.यदि इस बहने वाले जल को संचित किया जाय तो न केवल जल संकट से बचा जासकता है अपितु भू-जल स्तर में भी वृद्धि की जा सकती है .

यह सच है की विकास पर्यावरण और हम एअक दूसरे पर निर्भर है. इसका अर्थ यह नहीं हे की हम विकास ही न करे और न आगे बढे.मनुष्य को अपनी सीमाये अच्छी तरह जाननी चाहिए की पर्यावरण को प्रभावित किये बिना हम कैसे विकास कर सकते है.पानी के महत्व के विषय में प्रत्येक मनुष्य को जागरुक होना आवश्यक है.गिरते हुए भू-जल स्तर से आने वाला जीवन दुखों भरा होगा,जिसका कारण भी हम स्वयं होंगे. जल संरक्षण के लिये पानी का अपव्यय, जल का व्यवसायीकरण (बोतल बंद पानी,) में कमी लाकर तथा प्राकृतिक स्रोतों का अनुरक्षण, जल सुप्रंधन,वर्षा जल का प्रदेश एवं भवनों की संरचना के अनुरूप योग्य विधि अपनाकर जल सवंर्धन किया जा सकता है.संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ७ वर्ष पूर्व विश्वपर्यावरण दिवसकेअवसर पर दिए गये ब्रीद वाक्य “ पानी -इसके लिए २ अरब लोग मर रहे है .” की जो चेतावनी जो संपूर्ण विश्व को दी थी इसका हल जल संरक्षण एवं संवर्धन से ही संभव है अन्यथा जल संकट के कारन संभावित तृतीय विश्व युद्ध को टालना असंभव है . “ जल है तो कल है .”



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1 comment:

  1. एक अच्छी नई शुरुआत के लिए बधाई नितिन जी. आखिर जल ही तो जीवन .
    [] राकेश 'सोहम'

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