Monday, August 23, 2010

राखी का अनुपम उपहार

बचपन की बात है, अक्सर मै अपने दादाजी से कहानियां सुनाने को कहा करता था.वर्षा रितु, सावन का महिना था. चारों ओर हरियाली,पानी की फुहार गर्मी की तपिश को कम कर रही थी.वैसे भी श्रावण मास का भारतीय संस्कृति में सामाजिक,धार्मिक आध्यात्मिक एवं रूप से एक अलग महत्व है.मै,दादाजी के साथ बैठा था कि एकाएक घंटी बजी. मी दौड़ते-दौड़ते गया, दरवाजा खोला,तो देखा तो एक पंडितजी हाथ में कुछ सूत्र लिए थे.उन्होंने दादाजी को पूछा.मैंने दादाजी को बुलाया, पंडित जी ने एक मंत्र पढ़ा और गहरे गुलाबी कलर का रेशमी धागा उनकी कलाई पर बाँधा, फिर उन्होंने वही मंत्र पढ़ा और मेरे कलाई पर भी वैसा ही धागा बांध दिया.दादाजी ने उन्हें नेग दिया, मिठाई दी,फिर वो चले गए.मैंने दादाजी से पूछा, पंडितजी ने धागा क्यों बांधा? दादाजी ने बताया आज राखी पूर्णिमा है. आज के दिन बहने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती है, बदले में भाई अपने बहन की रक्षा करने का वचन देता है और उसे नेग देता, मिठाई खिलाता है. यह भाई-बहन के अटूट प्यार का त्यौहार है.पर दादाजी पंडित जी ने आपको और मुझको क्यों धागा बांधा? दादाजी ने कहा यह रक्षा सूत्र है.पंडित जी ने "येनबद्धो बलि राजा दानवेंद्रों महाबलः,तेन त्वां प्रतिबंधानामी रक्षे मा चल मा चल." यह मंत्र पढ़कर बांधा है.यह मंत्र रोगों का नाशक है और अशुभों को नष्ट करने वाला है. पुराणों के अनुसार देवों के गुरु ब्रहस्पति से मंत्रित रक्षासूत्र प्राप्त कर इन्द्राणी ने राजा इन्द्र की जीत के लिए और देवो की रक्षा हेतु इसे अपनाया था और दानवो से युद्ध में देवो की विजय हुई.इसी प्रकार भगवान कृष्ण ने जब सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया थातो उनके हाथ में चोट लग गई और रक्त निकालने लगा तब  द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का किनाराफाड़कर उनके हाथ में बांध दिया.उस समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उनकी रक्षा हेतु वचन दिया था.भगवान श्रीकृष्ण ने दुशासन द्वारा चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाई.यह राखी का महत्व है.यह सिर्फ धागा नहीं है. उसके पीछे की पवित्र भावनाए है, समझे.
समय के साथ त्योहारों को मानाने का तरीका भी बदल रहा है. जहाँ पहले रेशमी धागा हुआ करता था, घर- घर में बहाने अपने हाथ से राखी बनाया कराती थी वहां अब बाज़ारों में चीन से आई हुई सस्ती राखियाँ खूब उपलब्ध है, जो एक चिंता का विषय है कि चीन की घुसपैठ कितनी बढ़ती जा रही है.पहले उसने खिलौनों के जरिये हमारे बच्चों पर, सस्ती झालर, बल्ब,फ्रेंडशिप बेल्ट,वेलेंटाइन गिफ्ट और अन्य सामानों के जरिये हमारे घरों पर और अब राखी के जरिये हमारी बहनों पर अपना शिकंजा फैला रहा है और हम सस्ते के नाम पर उसे खरीद रहे है. कंही चीन की मंशा  अंग्रेजो की तरह व्यापार के जरिये भारत पर कब्ज़ा करने की तो नहीं! हमें सावधान रहने की जरूरत है.रक्षा बंधन का त्यौहार भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है.आज इन्ही परम्पराओं के चलते हमारी संकृति जीवित है. हाँ समय के साथ इसमे कुछ बदलाव जरूर महसूस किये जा रहे है.मुझे ऐसा लगता है कि,विदेशों से आयातित फ्रेंडशिप डे,वेलेंटाइन डे,मदर्स डे,फादर्स डे..आदि जरूर कब्ज़ा ज़माने का प्रयत्न कर रहे है, कही ऐसा न हो कि आगे आने वाले समय में रक्षा-बंधन "ब्रो-सिस डे" के रूप में न जाना जाय !शायद यही कारण है कि ऑनर किलिंग जैसी समस्याएं बढ़ रही है, परन्तु इन सब के बावजूद राखी का यह त्यौहार हमें आपस में जोड़े रखने का एक सशक्त माध्यम है. भाई-बहन एक ही वट वृक्ष की दो जटायें (लटकती हुई जड़े)है जो अलग-अलग होते हुए भी एक ही है.भाई-बहनों को राखी बांधने के उपलक्ष्य में उपहार देते है.आज हमारी बहने इतनी सक्षम है कि वे भी अपने भाइयों को बड़े से बड़ा उपहार दे सकती है,परन्तु उपहार से ज्यादा महत्व एक दूसरे के प्रति स्नेह है. वस्तुओं का उपहार समय के साथ पुराना हो सकता है, नष्ट हो सकता है, ख़राब हो सकता है.मेरे विचार में, मै अपने सब भाइयों से अनुरोध करूंगा कि वे इस राखी पर क्या हर राखी पर अपनी बहनों को ऐसा उपहार दे जो सालों साल याद रहे. जो पर्यावरण को हरा-भरा और सुरक्षित भी रखे, और आने पीढ़ी को स्वच्छ, प्रदूषण रहित वातावरण दे सके . जिसकी छाया से सभी लाभान्वित हो सके और जिसके फूलों से आसपास का सारा वातावरण महके. वह सुन्दर और अनोखे  आकर्षक उपहार एक हरे-भरे  छोटे पौधे से बेहतर कुछ नहीं हो सकता.वह भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को और मजबूती प्रदान करेगा. तो सभी भाई अपने बहनों को एक पौधा भेंट करे तथा दोनों मिलकर उसे इस शुभ अवसर पर लगाकर सभी को उसकी छाया से लाभान्वित करने का प्रयास करे. शुभ रक्षा बंधन. नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"

Thursday, August 19, 2010

आजादी के मायने !


मै,विगत सप्ताह बाहर गया था.पंद्रह अगस्त को सारा देश स्वतंत्रता की ६३वी वर्षगाँठ मना रहा था. मैंने भी मनाई.बड़ा ही सुखद पल था.पंद्रह अगस्त को हमारे मन में एक अलग ही जज्बा होता है.आज़ादी के बाद हमने अपने पडोसी मुल्कों के मुकाबले काफी तरक्की की है.जिस ब्रिटेन के हम गुलाम थे आज उसकी आर्थिक हालत ख़राब है. उसकी विकास दर कम हुई है. पाकिस्तान की आर्थिक हालत किसी से छिपी नहीं है, उसकी विकास दर कम होने के साथ उसकी गिनती आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों में हो रही है. इसके विपरीत भारत के आर्थिक हालत अच्छे हुए है, विकास दर में बढ़ोत्तरी हुई है.विश्व में हमारी ताकत बढ़ी है.आई.टी.क्षेत्र में दबदबा बढ़ा है. अन्तरिक्ष विज्ञानं में हमने बहुत तरक्की की है,जिसका लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है.मेरा ऐसा मानना है कि आर्थिक दृष्ट्या हम ऊँचे उठे है, परन्तु नैतिक रूप से हमारा पतन हुआ है.अंग्रेजो ने हमसे हमारा कुर्ता, पजामा,धोती, साड़ी, टोपी, बंडी,खादी....वगेरह लेकर हमको पेंट, शर्ट, टाई,टी-शर्ट,जींस,बरमूडा, उपभोक्तावाद,व्याव्साईकता, फूट डालो राज करो की नीतियां...आदि विरासत में दी है.हम धीरे-धीरे पाश्चात्य शैली में विकसित होते चले गए है और अब  हम न हम अपनी संस्कृति टिका पा रहे है और न पूर्ण रूपेण पाश्चात्य  शैली अपना पा रहे है.
 प्रतिस्पर्धा बुरी बात नहीं है,परन्तु उसकी आड़ मे  सत्ता की भूख,अधिक लोलुपता,आवश्यकता से अधिक धन संग्रह,स्वार्थीपन,खुलापन,आपसी वैमनस्यता,भ्रष्टाचार,हमें देश भक्ति से दूर लेकर जा रहा है और हम दिन रात धन कमाने के रास्ते सोचते रहते है.जब हमारा देश ही नहीं रहेगा तो हम क्या करेंगे? शायद हम इस ओर नहीं सोच रहे है, और अपने स्वार्थो की पूर्ती में लगे हुए है.  विगत ६३  वर्षों से हम आज़ादी का जश्न मना रहे है, आगे भी मनाएंगे. मैंने लोगो को जश्न मानते देखा है,परन्तु आज ऐसा महसूस होता है कि हम लोग आज़ादी के नाम पर मात्र औपचारिकता निभा रहे है. आज  भी स्वतंत्र भारत में एक किशोरी को सरे आम निर्वस्त्र घुमाना,महिला खिलाडियों के साथ  दुर्व्यवहार करना, रास्ते पर चलती महिलाओं को अगवा कर उनका बलात्कार  करना... क्या यही आज़ादी के मायने है? यह देखकर मन विचलित हो जा जाता है कि क्या हमने आज़ादी इसलिए प्राप्त की है? यह देखकर हमे ऐसा लगता है कि हमारे रणबांकुरों का बलिदान व्यर्थ चला गया है.महारानी लक्ष्मी बाई,तात्या टोपे,सरदार भगतसिंह,चन्द्रशेखरआजाद,राजगुरु,खुदीरामबोस,चाफेकरबंधू,बलवंतफडके...और न जाने कितने वीरों ने अपने खून से सींच कर हमें यह आज़ादी दी है परन्तु हम है की उसको हलके ढंग में ले रहे है और उनके बलिदान को अपमानित कर रहे है.शायद हम लोगो की आत्मा मर चुकी है.चारो और बढ़ता आतंकवाद, नक्सलवाद,अलगाववाद,भ्रष्टाचार,जनसेवको द्वारा सत्ता का दुरुपयोग.. हमें नैतिक पतन की और ले जा रहा है.आज हम स्वतंत्रता का मतलब यह लेते है कि हमें जो करना है हम करेंगे, चाहे उचित हो या अनुचित! हमें नियम तोड़ना अच्छा लगता है और हम अपनी कॉलर पकड़कर कहते है की हम स्वतंत्र है! रेल फाटक बंद होने पर उसके नीचे से निकलना,प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी रेल में शौच करना,चलती बस मे से केले खाकर बाहर फेकना,जलते बीडी-सिगरेट के ठूंठे बिना बुझाये फेकना,नशे की हालत में वाहन चलाना, फुटपाथ पर सोते थके-हारे मजदूरों पर वाहन चढ़ाना,नो-पार्किंग वाले स्थानों पर वाहन पार्क करना,मित्रों के साथ बीच रास्तों पर खड़े होकर बातचीत करना, किसी बुजुर्ग ने टोकने पर चुप रह बुढ्ढे कहना,विवाहों/उत्सवो पर कर्कश ध्वनी में गाने बजाना,पतली प्रतिबंधित पौलीथीन में कचरा भरकर रास्तों पर फेकना,नदियों,तालाबों को प्रदूषित करना,कमजोर वर्ग को कपडे देने के बजाये उसके कपडे उतरवाना,अनुचित रूप से धन कमाना,खाने की वस्तुओं में मिलावट करना,गन्दी राजनीती से लोगो के दिलो को बांटना,रेव्ह पार्टियों में अश्लीलता,मौज-मस्ती करना,वाहनों पर पुरुष मित्रों के साथ दुपट्टा बांधकर असंयमित आचरण करना,बगीचों में युवक-युवतियों द्वारा अमर्यादित व्यव्हार त्योहारों पर भोंडे नृत्यों का प्रदर्शन करना.... आदि. अंत में कहना चाहूँगा कि एकघडी,आधी घडी, आधी से पुनि आध, नेता संगत "भाई" की करे कोटि अपराध.यह इंगित करता है कि स्वतंत्रता या आज़ादी के यही मायने है! 
                                                                                    नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"  

Wednesday, August 11, 2010

क्या सोचेंगे..तिलक जी !

 "स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्धअधिकारहै."उक्तवाक्यांश लोकमान्यबाल गंगाधर तिलक जी द्वारा कहे गए थे.अगस्त की पहली तारीख को उनकी नब्बेवी पुण्यतिथि थी .जिनका स्मरण विभिन्न समाचार पत्रों द्वाराकिया गया है,परन्तु मुझे ऐसा लगता है की वो भी शायद मित्रता दिवस की आंधी में उड़ गया.तिलक जी को स्वर्ग में बैठे- बैठे आत्मग्लानी हो रही होगी जब उन्होंने देखा होगा की उनके वाक्यांशों का आज अक्षरशः पालन किया जा रहा है,वो भी उनकी कर्मभूमि पुणे नगरी में जहाँ लगभग साढ़े तीनसो युवक युवतियों,जो की एक दूसरे को अपना मित्र कहते है,"फ्रेंडशिप डे" मनाते है वो भी पूरी स्वतंत्रता के साथ जहाँ नशा खोरी, मौज मस्ती के सारे इंतजाम थे. तिलक जी ने सपने में भी न सोचा होगा कि सालों बाद युवा पीढ़ी उनके शब्दों को इस प्रकार समझेगी. आज हम वैश्विक बाजारवाद, उपभोक्तावाद और भौतिकता के मकडजाल में इस तरह से उलझ गए है कि हम अपना सब कुछ भूलकर प्रतिदिन एक नया "डे" मानते है जो कही से इम्पोर्टेड है.मुझे याद है बचपन में हम बाल दिवस, शिक्षक दिवस,शाला में गुरुपूर्णिमा दिवस.. आदि मानते थे ,परन्तु पाश्चात्यीकरण की "लैला" ने हमको ही हमारे माता-पिता याद को करना सिखा दिया और  हम आज बड़े शौक से मदर्स डे, फादर्स डे मानते है. उनको बड़े- बड़े होटलों में ले जाकर पार्टियाँ करते है,पेपरों में फोटो छपवाते है.परन्तु उनका सम्मान करने,चरण छूने में, उनको उनकी वृद्धावस्था में घर में रखने में शर्म महसूस करते है और फिर "बागवान" की याद ताज़ा कर देते है.कहने का अर्थ यह है कि हम लोग औपचरिकता में ज्यादा विश्वास करने लगे है.विश्व में भारत वर्ष एक मात्र ऐसा देश है जहाँ व्यापार की अपार सम्भावनाये है. यहाँ कुछ भी बेचो, बिकता है, फिर वह टैटू, वे ब्लेड, फ्रेंडशिप बेल्ट,आदि क्यों न हो.यहाँ की आबादी इतनी है कि यदि आबादी का कम से कम एक परसेंट सामान भी बिकता है तो भी वो लोग फायदे में होंगे.आज हमारे तीज-त्यौहार मात्र औपचारिकता निभा रहे है और मदर्स डे, फादर्स डे,वेलेंटाइन डे,फ्रेंडशिप डे.... और न जाने क्या-क्या!मजे की बात यह है कि विदेशी सभ्यता में राखी को सिस्टर्स डे करके कभी नहीं मनाते. आज बड़ी हास्यास्पद बात यह है चाइना द्वारा हमारे बाज़ार में उतारा गया माल खूब बिक रहा है और "डे' मानाने की प्रथा ने तो उनकी चांदी कर दी है. आज हमारे बच्चे भी हमारे नहीं रहे,वो भी खाने में चाइनीज़ पसंद करने लगे है. मुझे कुछ दिनों पहले एक एस.एम.एस.आया, जिसमे लिखा था कि मुंबई में आई.सी.एस.सी.की छटवी कक्षा की सोशल साइंस की किताब के ६४ -६५ वे पन्ने में शहीद भगत सिंग,राजगुरु एवं सुखदेव को आतंकवादी कहा गया है, यदि ये सही है, तो हम सबके लिए और स्वतंत्र भारत के लिए एक शर्म की बात है, जहाँ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को आतंकवादी कहा गया है.ये देखकर तिलक जी क्या सोच रहे होंगे? क्या यह चिंता का विषय नहीं है ?आज शायद हम लोगो को आत्म मंथन करने की आवश्यकता है.हमारे स्वतंताता संग्राम सेनानियों को याद करने की, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमको आज़ादी दिलाई. उनके नाम से यदि "डे" मनाये तो तीन सौ पैंसठ दिन भी कम पड़ जायेंगे.व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ने बाज़ार में ऐसी ऐसी वस्तुए,खिलौने निकाले हैजो लगातार पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे है और हम है की "डे" के नाम पर उसका अंधाधुन्द प्रयोग कर रहे है.मित्रता में त्याग होता है स्वार्थ नहीं. सही मायने में यदि स्वार्थ है तो मित्रता नहीं और मित्रता है तो स्वार्थ नहीं. पुणे की फ्रेंडशिप सेलिब्रेशन  क्या थी मेरी समझ में नहीं आई. .में तो यही कहूँगा की अब तो जागें और अपने कृत्यों से बड़ो को न लजाये.
नितिन देसाई

Thursday, August 5, 2010

वृक्ष लगाओ,जन्मदिन मनाओ

                                                  वृक्ष लगाओ तो पुण्य मिलेगा,

                                                  वृक्ष पालोगे तो सुख मिलेगा.
 
पर्यावरण की सुरक्षा हमारा नैतिक दायित्व भी है और कर्त्तव्य भी.प्रत्येक मनुष्य को अपने प्रारब्ध के अनुसार जन्म मिलाता है,पर कर्म करना उसके हाथ में होता है."गिव एंड टेक "का फार्मूला सभी जगह चलता है. यदि आप प्रकृति की रक्षा करोगे तो प्रकृति भी आपका ख्याल रखेगी.जन्म दिन मनाने के अनेक प्रकार होते है. कोई घर में मनाता है, कोई होटल में, तो कोई मंदिर में, तो कोई आउटिंग पर जाकर आदि-आदि.मेरे विचार में,वस्तुतः जब हम पैदा होते है तो सबसे छोटे होते हुए भी आयु के मामले में सबसे बड़े होते है. उस दिन हम सौ प्रतिशत आयु वाले होते है.जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है,हम हम बड़े तो होते है,पर हकीकत में हमारी आयु घटती है.मनुष्य उसे नहीं जानता. यदि वो ईश्वर द्वारा प्रदत्त  इस सुन्दर वसुंधरा को हमेशा हरा भरा रखने का संकल्प ले तो प्रदूषण निरंतर कम होता जायेगा और मानव को शुद्ध वायु, शुद्ध जल अपने आप मिलता रहेगा और वह भी स्वस्थ रहेगा.विगत चार-पांच वर्षों से मै अपना जन्मदिन पौधा रोप कर मनाता हूँ, और अपने परिवार के सदस्यों का जन्मदिवस भी वृक्ष रोपण कर इस प्रकृति को हरा भरा रखने में एक बहुत छोटा सा योगदान करता हूँ.जबलपुर में कदम संस्था द्वारा प्रतिदिन पौधा रोपा जाता है.मैं कदम संस्था का सक्रीय सदस्य हूँ और "पर्यावरण मित्र" होने के नाते आप सबसे एवं सारे विश्व के भाई, बहनों, मित्रों से यह अपील करता हूँ की आप सब भी जहाँ कही भी हों अपने जन्मदिन पौधा रोपकर मनाये. आज मेरा जन्मदिन है. आज प्रकृति ने मुझसे एक पुण्य का कम करा लिया, मैंने जबलपुर में एन.सी.सी. कार्यालय के परिसर में पौधा रोपकर अपना जन्मदिन मनाया.मुझे उसमे इतनी ख़ुशी मिली जिसका जिक्र शब्दों से नहीं किया जा सकता.बस यही कह सकता हूँ कि हमारी उम्र तो कम होती जायगी पर वृक्ष की बढ़ती जाएगी और वो  दिनों-दिन बढेगा,लोगो को छाया देगा,हवा देगा, आराम देगा.
                                                      वृक्ष हमारा दाता है,
                                                   हवा छाया औषधि दिलाता है.
                                                               



                 नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"