"स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्धअधिकारहै."उक्तवाक्यांश लोकमान्यबाल गंगाधर तिलक जी द्वारा कहे गए थे.अगस्त की पहली तारीख को उनकी नब्बेवी पुण्यतिथि थी .जिनका स्मरण विभिन्न समाचार पत्रों द्वाराकिया गया है,परन्तु मुझे ऐसा लगता है की वो भी शायद मित्रता दिवस की आंधी में उड़ गया.तिलक जी को स्वर्ग में बैठे- बैठे आत्मग्लानी हो रही होगी जब उन्होंने देखा होगा की उनके वाक्यांशों का आज अक्षरशः पालन किया जा रहा है,वो भी उनकी कर्मभूमि पुणे नगरी में जहाँ लगभग साढ़े तीनसो युवक युवतियों,जो की एक दूसरे को अपना मित्र कहते है,"फ्रेंडशिप डे" मनाते है वो भी पूरी स्वतंत्रता के साथ जहाँ नशा खोरी, मौज मस्ती के सारे इंतजाम थे. तिलक जी ने सपने में भी न सोचा होगा कि सालों बाद युवा पीढ़ी उनके शब्दों को इस प्रकार समझेगी. आज हम वैश्विक बाजारवाद, उपभोक्तावाद और भौतिकता के मकडजाल में इस तरह से उलझ गए है कि हम अपना सब कुछ भूलकर प्रतिदिन एक नया "डे" मानते है जो कही से इम्पोर्टेड है.मुझे याद है बचपन में हम बाल दिवस, शिक्षक दिवस,शाला में गुरुपूर्णिमा दिवस.. आदि मानते थे ,परन्तु पाश्चात्यीकरण की "लैला" ने हमको ही हमारे माता-पिता याद को करना सिखा दिया और हम आज बड़े शौक से मदर्स डे, फादर्स डे मानते है. उनको बड़े- बड़े होटलों में ले जाकर पार्टियाँ करते है,पेपरों में फोटो छपवाते है.परन्तु उनका सम्मान करने,चरण छूने में, उनको उनकी वृद्धावस्था में घर में रखने में शर्म महसूस करते है और फिर "बागवान" की याद ताज़ा कर देते है.कहने का अर्थ यह है कि हम लोग औपचरिकता में ज्यादा विश्वास करने लगे है.विश्व में भारत वर्ष एक मात्र ऐसा देश है जहाँ व्यापार की अपार सम्भावनाये है. यहाँ कुछ भी बेचो, बिकता है, फिर वह टैटू, वे ब्लेड, फ्रेंडशिप बेल्ट,आदि क्यों न हो.यहाँ की आबादी इतनी है कि यदि आबादी का कम से कम एक परसेंट सामान भी बिकता है तो भी वो लोग फायदे में होंगे.आज हमारे तीज-त्यौहार मात्र औपचारिकता निभा रहे है और मदर्स डे, फादर्स डे,वेलेंटाइन डे,फ्रेंडशिप डे.... और न जाने क्या-क्या!मजे की बात यह है कि विदेशी सभ्यता में राखी को सिस्टर्स डे करके कभी नहीं मनाते. आज बड़ी हास्यास्पद बात यह है चाइना द्वारा हमारे बाज़ार में उतारा गया माल खूब बिक रहा है और "डे' मानाने की प्रथा ने तो उनकी चांदी कर दी है. आज हमारे बच्चे भी हमारे नहीं रहे,वो भी खाने में चाइनीज़ पसंद करने लगे है. मुझे कुछ दिनों पहले एक एस.एम.एस.आया, जिसमे लिखा था कि मुंबई में आई.सी.एस.सी.की छटवी कक्षा की सोशल साइंस की किताब के ६४ -६५ वे पन्ने में शहीद भगत सिंग,राजगुरु एवं सुखदेव को आतंकवादी कहा गया है, यदि ये सही है, तो हम सबके लिए और स्वतंत्र भारत के लिए एक शर्म की बात है, जहाँ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को आतंकवादी कहा गया है.ये देखकर तिलक जी क्या सोच रहे होंगे? क्या यह चिंता का विषय नहीं है ?आज शायद हम लोगो को आत्म मंथन करने की आवश्यकता है.हमारे स्वतंताता संग्राम सेनानियों को याद करने की, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमको आज़ादी दिलाई. उनके नाम से यदि "डे" मनाये तो तीन सौ पैंसठ दिन भी कम पड़ जायेंगे.व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ने बाज़ार में ऐसी ऐसी वस्तुए,खिलौने निकाले हैजो लगातार पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे है और हम है की "डे" के नाम पर उसका अंधाधुन्द प्रयोग कर रहे है.मित्रता में त्याग होता है स्वार्थ नहीं. सही मायने में यदि स्वार्थ है तो मित्रता नहीं और मित्रता है तो स्वार्थ नहीं. पुणे की फ्रेंडशिप सेलिब्रेशन क्या थी मेरी समझ में नहीं आई. .में तो यही कहूँगा की अब तो जागें और अपने कृत्यों से बड़ो को न लजाये.
नितिन देसाई
नितिन देसाई

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