मुझे, विगत वर्ष पितृपक्ष में बरसी कार्यक्रम हेतु जाना था. मै तैयार होकर रेलवे स्टेशन पहुँचा स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि एकाएक मेरे दो पर्यावरण मित्र श्री विजय शर्मा और श्री सुनील यादव जी दिखाई पड़े.मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई कि चलो.. मित्रों के साथ यात्रा का मजा अलग ही होगा. मैंने पूछा कहाँ का कार्यक्रम है?उन्होंने बताया चारों ओर प्रदूषण बढ़ रहा है इसलिए पर्यावरण परिसर, भोपाल, एक ज्ञापन देने जा रहे है. मैंने सोचा चलो इसी तरह समाज में धीरे-धीरे जाग्रति आएगी.वैसे भी आजकल सभी ज्ञात प्रदूषणों के आलावा टी.वी. चैनल्स पर अधिकांश सीरियल्स/ धारावाहिकों द्वारा अत्यधिक मानसिक प्रदूषण फैलाया जा रहा है और उस पर किसी का कोई अंकुश नहीं है.”सी” “रियल्स” अर्थात सच्चाई दिखाना. वे मुद्दा रियल उठाते है और काल्पनिक रूप से आर्टिफिशियल जामा पहना कर इतना लम्बा खीचते है कि उससे सुगन्धित और प्रफुल्लित वातावरण होने के बजाय प्रदूषित और बदबूदार वातावरण निर्मित हो रहा है. एक बार भीड़ होने पर रेलवे वाले अतिरिक्त कोच लगाने से परहेज कर सकते है पर आजकल सीरियल्स के अधिकतर निर्माता निर्देशक उसकी कड़ियाँ ऐसे बढ़ाते है जैसे कि हनुमान जी की पूँछ हो. इस पर सुनील जी कुछ कहने ही वाले थे कि रेल प्लेटफ़ॉर्म पर आ गई. हम लोग कोच में बैठ गए. रेल अपनी गति से चल रही थी.कुछ लोग बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे,कुछ पेपर/मैगज़ीन पढ़ रहे थे,कुछ मूंगफली/चिप्स खा रहे थे… इतने में इलायची वाली चाय….गरम चाय की आवाज आयी तो दूसरे तरफ से खीरा लो खीरा.. ताज़ा खीरा की आवाज़ आयी.इन सब के बीच बाजूवाले डिब्बे से बड़ा ही मधुर स्वर सुनाई दे रहा था परन्तु दूरी के कारण बोल स्पष्ट सुनाई नहीं दे रहे थे. हम लोग अपनी बातों में व्यस्त थे कि देखा गाने वाली टोली जिसमे १३-१४ साल के दो लडके और एक लड़की,जो, मैले कुचैले से कपडे पहने हुए थे, ने डिब्बे में प्रवेश किया और लड़की ने गाना चालू किया. एक लडके के हाथ में रंग के डिब्बे से बनाया हुआ गिटार था, तो दूसरे के हाथ में एस्बेस्टस की टूटी हुई चिप्पियाँ थी, जिसे उसने अपने दोनों हाथों में बड़ी खूबसूरती से फंसा रखा था, बजा रहा था.पास आने पर गाना एकदम साफ़ सुनाई दिया. गाने के बोल थे ” जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते है लोग, एक चहरे पर कई चहरे लगा लेते है लोग…. ” मैंने विजय से कहा गाना और उसका प्रस्तुतीकरण तो समाज के मुखौटों पर तमाचा है. विजय भाई आपने भी तो अपने व्यंग में कुछ इसी तरह से कहा है ज़रा सुनाइये, सफ़र भी कट जाएगा और मनोरंजन भी. इस पर विजय भाई ने बताना शुरू किया.. वर्तमान समय,समाज में दो तरह के मुखौटे लगाये हुए लोगो का है. एक समाज की व्यवस्था से संघर्ष कर रहा है तो दूसरा अपने आप को समाज में स्थापित करने हेतु अवैध तरीका अपनाकर घुन की तरह लगा हुआ है. उसे न समाज से मतलब है न संस्था से और देश से तो बिलकुल नहीं.वह आत्मस्तुति में लगा है. वह छपवास और बकवास में लिप्त है और उस होड़ में अपने को बनाये रखने हेतु कोई कसर नहीं छोड़ता.उनके दांत हाथी के होते है जो खाने के अलग और दिखाने के अलग. जो भी कल्याणकारी योजनायें आती है उसका ज्यादातर लाभ ये लोग लेकर सारा क्रेडिट खुद ले लेते है. ऐसे लोग दूधों नहाये और पूतों फले इस हेतु स्वामी घुनानंद के मस्तिष्क में एक युक्ति आई, क्यों न ऐसी दिव्य औषधि बनाई जाय जिससे सभी का कल्याण हो सके सभी उसे पाकर धन्य महसूस करे. इस विचार धारा से प्रेरित होकर स्वामी घुनानंद ने विचार किया किया कि कोई ऐसी तेल रूप औषधि बनाई जाय जिससे अधिक से अधिक लाभ मिल सके. जिसके लेपन से मानसिक और शारीरिक और पंगुता जैसी सारी व्याधियां दूर हो जाय तथा लोलुपता वाली ताज़गी का अहसास हो. दुनिया भर के सारे कार्य आसानी से हो जाय तथा सांप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे. इसी मंथन में स्वामी घुनानंद अपने अनुसन्धान में लग गए. इस हेतु उन्होंने संसार भर के सारे सरकारी, गैर सरकारी कार्यालयों,ब्लाक, तहसीलों, पंचायतों, विद्यालयों, शिक्षा के मंदिरों,मंत्रालयों,कारखानों,खेतों,राजनैतिक ईकाईयो, पुलिस, उद्योग, कर वसूली विभागों, सहकारी संस्थाओं, वित्तीय/गैर वित्तीय संस्थाओं.. आदि से होते हुए जंगलों में घोर तपस्या कर के उत्तम गुणवत्ता वाली जड़ी बूटियों जिसमे महिमामंडन, रिश्वतखोरी,गुणगान,चमचागिरी,नियमों विरुद्ध कार्य,सत्य का गलाघोटना, लेटलतीफी,अवसरवादिता,घर पहुंच सेवा… इत्यादी मिलाकर इनके सत्व को बड़े जतन से धैर्यपूर्वक निकालकर एक तरल पदार्थ का निर्माण किया जिसका नाम उन्होंने ” घुनानंद का तेल ” रखा.अब उसको बाज़ार में लाकर बिक्री करना था तो आचार्य घुनानंद ने मुहूर्त के बारे में सोचना शुरू किया. इस हेतु उन्होंने बड़े बड़े पंडितों, ज्योतिषाचार्यों, टी वी पर आने वाले भविष्य वेधत्ताओं आदि से संपर्क किया और जनमानस में लाने हेतु उत्कृष्ट मुहूर्त का चयन किया. घुनानंद जी ने विपणन कंपनियों से संपर्क करके उसका विज्ञापन तैयार किया जिसमे सभी विवादस्पद कलाकारों ने बिना किसी हिचक के और सार्वजनिक हित में उसका विज्ञापन दिया और बड़े जोर से कहा कि मूल्यवान,चमत्कारी,गुणकारी,असरकारी और ९८% लाभकारी सफलता दिलाने वाला घुनानंद का तेल औषधि रूप है और इसे प्रत्येक परिवार का मुखिया, स्त्री, पुरुष यहाँ तक की बच्चे विशेष दर पर प्राप्त कर सकते है. स्वामी जी ने बड़े जातां से इसे पाउच से लेकर बड़ी पैकिंग में उपलब्ध कराया है और इसकी विश्वसनीयता हेतु इस पर पर्ची चिपकाई है जिसका विवरण इस प्रकार है.
स्वामी घुनानंद जी महाराज,
घुनानंद मठ, सरकारी कुआ,
बाई का बगीचा, चिकना घड़ा,
हल्का प्रदेश.
स्वामी जी का आव्हान था अब तो समाज को बिलकुल मत छोडो और अपना नाम सार्थक करो तेल की तरह चिपको..घुनानंद की औषधि अपनाओ, सारी व्याधियां दूर भगाओ.घुनानंद जिंदाबाद.घुनानंद जिंदाबाद.
वाह! विजय भाई, अपने तो कमाल कर दिया पर अब ये बताओ कि मुझे यह औषधि कब मिलेगी ? सुनील जी ने कहा! इतने में एक स्टेशन आया और हम नीचे उतरे. गाने वाली टोली भी उतर कर गाने लगी“एक दिन बिक जायेगा माटी के मोल, जग में रह जायेंगे प्यारे तेरे बोल……” तथा अगले डिब्बे की ओर कूच कर गई और मस्तिष्क में एक विचार छोड़ गई.
मूल विचार श्री विजय शर्मा,”पर्यावरण मित्र” प्रस्तुतीकरण नितिन देसाई.
सुमन की सुगंध चारों ओर विसरित होती है किन्तु वह दिखाई नहीं देती.बाग,बगीचे,वन,उपवन,ताल,तलैय्या,नदी,पहाड़,हरियाली सबपर्यावरण के साथी है.इनकी सुरक्षा करना मानव जाती का नैतिक दायित्व है.निसर्ग हमें बारम्बार चेतावनी देता है कितु हम उसे नज़रंदाज़ करते है.आज पर्यावरण के मित्र कम और शत्रु अधिक हो गये है.जिसका दंड भोगना निश्चित है.तो आइये आज से ही हम उसे बचाने का संकल्प लेकर उसके शुभचिंतक और "मित्र" बनकर उसे प्रदूषण से मुक्त कराने में अपना योगदान दे.
Thursday, October 21, 2010
Sunday, September 12, 2010
Wednesday, September 8, 2010
शिक्षक सम्मान की हकीकत
पांच सितम्बर को शिक्षक दिवस था. हम सभी जानते है कि भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्मदिवस को हम शिक्षक दिवस के रूप में मनाते है.उस दिन मै सुबह -सुबह समाचार पत्र पढ़ रहा था. समाचार पत्र में शिक्षक दिवस के समाचार सुर्ख़ियों में थे. एक समाचार था, शिक्षक दिवस शिक्षकों का सम्मान होगा,दूसरा समाचार था,दो शिक्षकों पर लटकी निलंबन की तलवार, तीसरा समाचार था,देश में बारह लाख शिक्षकों की कमी, चौथा, म.प्र.के शिवपुरी जिले के बैराड़ थाना अंतर्गत खरई डाबर गाँव में वेतन न मिलने से दो शिक्षकों ने आत्महत्या की,... आदि यह सब पढ़कर मेरा दिमाग भन्नाया कि ऐसा क्यों हो रहा है? कहीं मै पीपली लाइव तो नहीं देख रहा!समाचारों में एक समाचार सकारात्मक था,बाकि के सब नकारात्मक थे. कहीं हमारी शिक्षा पद्धति नकारात्मक दिशा में तो नहीं जा रही है?
वास्तव में शिक्षक का मूल उद्देश्य शिक्षा देना है न की अर्थार्जन करना,परन्तु बदलते परिवेश में शिक्षक को भी अपना परिवार चलाना है.यदि उसकी मूलभूत सुविधाओं का ध्यान नहीं रखा जाय तो शिक्षक की शिक्षण पद्धति में असर तो पड़ेगा ही.कहते है "भूखे पेट भजन न होई गोपाला ." वैसे ही पूरी पगार न मिलने और अपना कार्य करने के लिए शिक्षकों को अफसरों के चक्कर काटने पड़ते है, आवश्यकता पड़ने पर चढ़ोतरी भी चढ़ानी पड़ती है, इसके अतिरिक्त अनेकों ऐसे कार्य है,मसलन टीकाकरण, जनगणना, पल्स पोलिओ दवा पिलाना, चुनाव, मतगणना... आदि तो ऐसे हम उनसे क्या अपेक्षा रख सकते है.आजकल अधिकांश शिक्षक ऐसे है जिन्हें अपने कार्य से संतोष नहीं है, उनका मन हीन भावना से ग्रस्त रहता है, वे अपने को जीवन भर कोसते रहते है, वे किसी मजबूरी के तहत शिक्षक के पेशे को अपनाये रहते है.ऐसे में उनसे गुणवत्ता की उम्मीद करना बेमानी होगी, आखिरकार वे भी इन्सान है. इन सब विसंगतियों के बावज़ूद "शिक्षक" यह पद सम्माननीय है.वह समाज में दिखाई देने वाले कंगूरों के नीव का पत्थर है. वह एक कुम्हार की तरह है जो अपने विद्यार्थीयों को एक आकार प्रदान करता है,फिर चाहे वो सहायक शिक्षक हो, चाहे प्राध्यापक, चाहे संविदा शिक्षक या फिर गुरूजी, ये सभी चरित्र निर्माण की भूमिका अदा करते है, जो समाज के उत्थान या पतन का करक बनता है.. आधुनिकता के चलते शिक्षक दिवस मनाने का तरीका बदल गया है,जैसे वो ग्रीटिंग देकर हो या पुष्प गुच्छ देकर पर उसका मूल आधार तो शिक्षकों का सम्मान करना है,और उनके पद को नमन करना है.कहते है न,चित्रपट समाज का आइना होता है तो फिल्मवालों ने भी शिक्षक के विभिन्न रूपों को अपने परदे पर उतारा है. कुछ फिल्मो में उसे गंभीर,अनुशासनप्रिय और कहीं मसखरा दिखया है.मुझे कुछ फिल्मे याद है जैसे जाग्रति,परिचय, चुपके-चुपके, कस्मे-वादे,मोहब्बतें, मेजरसाब,ब्लेक,बुलंदी,तारे जमीं पर,थ्री इडियट्स.. आदि. इसके अलावा १९७२ में अनंत माने की मार्मिक कहानी को वी. शांताराम ने निर्देशित किया,शंकर पाटिल के संवाद और जगदीश खेबुडकर के गीतों को राम कदम ने संगीत में ढाला है,मराठी का बड़ा ही प्रसिद्ध चित्रपट पिंजरा है,जिसमे श्रीराम लागू ने एक आदर्शवादी शिक्षक की तो संध्या ने तमाशबीन और नीलु फुले ने खलनायक की भूमिका अदा की है.आदर्शवादी शिक्षक गाँव में तमाशा आने का विरोध करता है और बच्चों,बड़ों को तमाशा देखने से मना करता है. तमाशबीन संध्या उसे खुली चुनौती देती है कि वह उससे डपली बजवा कर रहेगी.परिस्थितियां ऐसी बनती है कि आदर्शवादी शिक्षक तमाशबीन महिला के चक्कर आ जाता है.मन ही मन उसे आत्मग्लानी होती है पर वह मजबूर होता है. गाँव में एक हत्या होती है. परिस्थितिवश शिक्षक अपने कपडे लाश को और लाश के कपडे खुद पहन लेता है और तमाशबीनो की टोली में शामिल हो जाता है.गाँव में में यह प्रचारित हो जाता है कि शिक्षक मर गया. उसके आदर्शवादिता के कारण गाँव में उसकी मूर्ती स्थापित कर उसे सम्मानित किया जाता है. उधर शिक्षक तमाशबीनो की टोली में डपली बजाता है. खाने के समय एक कुत्ता शिक्षक के बाजू में आकर बैठता है और रोटी खाता है.शिक्षक पानी पानी हो जाता है. बाद में पुलिस आकर परिवर्तित शिक्षक को शिक्षक की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार करती है.कहने का अर्थ यह है की शिक्षक के आदर्श मरणोपरांत भी जीवित रहते है.हाथ की जैसे पांचो उँगलियाँ बराबर नहीं होती वैसे सबसे एक जैसा होने को उम्मीद रखना भी बेमानी है.हमारे यहाँ शिक्षक अर्थात गुरु अर्थात अंधकार को दूर कर प्रकाशवान बनाने वाला व्यक्तित्व है. इसलिए कहा गया है - " गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लगौ पाय, बलिहारी गुरु आपनी गोविन्द दियो बताय. " परन्तु आजकल के विद्यार्थी, लडके अपने शिक्षक से इस दोहे को इस प्रकार से कहते और उम्मीद रखते है " गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लगौ पाय, बलिहारी गुरु आपनी नंबर दियो बढ़ाय."
Saturday, September 4, 2010
आखिर कब तक.....: पुस्तक के बारे में...
आखिर कब तक.....: पुस्तक के बारे में...: " प्रातःकाल की बेला थी,प्राची से रश्मि का उदय,सुबह-सुबह मैं बालकनी में बैठा भुवन भास्कर को निहार रहा था कि एकएक मुझे मेरे चहेत..."
रवि की रश्मियाँ: जिज्ञासा
रवि की रश्मियाँ: जिज्ञासा: "पतझड़ की एक संध्या में, बीहड़ में से एक मुसाफिर चला जा रहा था, पैरों तले रोंदते हुए पत्तों को, चरमराते हुए पत्ते ने प्रश्न पूछा, कौ..."
Monday, August 23, 2010
राखी का अनुपम उपहार
बचपन की बात है, अक्सर मै अपने दादाजी से कहानियां सुनाने को कहा करता था.वर्षा रितु, सावन का महिना था. चारों ओर हरियाली,पानी की फुहार गर्मी की तपिश को कम कर रही थी.वैसे भी श्रावण मास का भारतीय संस्कृति में सामाजिक,धार्मिक आध्यात्मिक एवं रूप से एक अलग महत्व है.मै,दादाजी के साथ बैठा था कि एकाएक घंटी बजी. मी दौड़ते-दौड़ते गया, दरवाजा खोला,तो देखा तो एक पंडितजी हाथ में कुछ सूत्र लिए थे.उन्होंने दादाजी को पूछा.मैंने दादाजी को बुलाया, पंडित जी ने एक मंत्र पढ़ा और गहरे गुलाबी कलर का रेशमी धागा उनकी कलाई पर बाँधा, फिर उन्होंने वही मंत्र पढ़ा और मेरे कलाई पर भी वैसा ही धागा बांध दिया.दादाजी ने उन्हें नेग दिया, मिठाई दी,फिर वो चले गए.मैंने दादाजी से पूछा, पंडितजी ने धागा क्यों बांधा? दादाजी ने बताया आज राखी पूर्णिमा है. आज के दिन बहने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती है, बदले में भाई अपने बहन की रक्षा करने का वचन देता है और उसे नेग देता, मिठाई खिलाता है. यह भाई-बहन के अटूट प्यार का त्यौहार है.पर दादाजी पंडित जी ने आपको और मुझको क्यों धागा बांधा? दादाजी ने कहा यह रक्षा सूत्र है.पंडित जी ने "येनबद्धो बलि राजा दानवेंद्रों महाबलः,तेन त्वां प्रतिबंधानामी रक्षे मा चल मा चल." यह मंत्र पढ़कर बांधा है.यह मंत्र रोगों का नाशक है और अशुभों को नष्ट करने वाला है. पुराणों के अनुसार देवों के गुरु ब्रहस्पति से मंत्रित रक्षासूत्र प्राप्त कर इन्द्राणी ने राजा इन्द्र की जीत के लिए और देवो की रक्षा हेतु इसे अपनाया था और दानवो से युद्ध में देवो की विजय हुई.इसी प्रकार भगवान कृष्ण ने जब सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया थातो उनके हाथ में चोट लग गई और रक्त निकालने लगा तब द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का किनाराफाड़कर उनके हाथ में बांध दिया.उस समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उनकी रक्षा हेतु वचन दिया था.भगवान श्रीकृष्ण ने दुशासन द्वारा चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाई.यह राखी का महत्व है.यह सिर्फ धागा नहीं है. उसके पीछे की पवित्र भावनाए है, समझे.समय के साथ त्योहारों को मानाने का तरीका भी बदल रहा है. जहाँ पहले रेशमी धागा हुआ करता था, घर- घर में बहाने अपने हाथ से राखी बनाया कराती थी वहां अब बाज़ारों में चीन से आई हुई सस्ती राखियाँ खूब उपलब्ध है, जो एक चिंता का विषय है कि चीन की घुसपैठ कितनी बढ़ती जा रही है.पहले उसने खिलौनों के जरिये हमारे बच्चों पर, सस्ती झालर, बल्ब,फ्रेंडशिप बेल्ट,वेलेंटाइन गिफ्ट और अन्य सामानों के जरिये हमारे घरों पर और अब राखी के जरिये हमारी बहनों पर अपना शिकंजा फैला रहा है और हम सस्ते के नाम पर उसे खरीद रहे है. कंही चीन की मंशा अंग्रेजो की तरह व्यापार के जरिये भारत पर कब्ज़ा करने की तो नहीं! हमें सावधान रहने की जरूरत है.रक्षा बंधन का त्यौहार भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है.आज इन्ही परम्पराओं के चलते हमारी संकृति जीवित है. हाँ समय के साथ इसमे कुछ बदलाव जरूर महसूस किये जा रहे है.मुझे ऐसा लगता है कि,विदेशों से आयातित फ्रेंडशिप डे,वेलेंटाइन डे,मदर्स डे,फादर्स डे..आदि जरूर कब्ज़ा ज़माने का प्रयत्न कर रहे है, कही ऐसा न हो कि आगे आने वाले समय में रक्षा-बंधन "ब्रो-सिस डे" के रूप में न जाना जाय !शायद यही कारण है कि ऑनर किलिंग जैसी समस्याएं बढ़ रही है, परन्तु इन सब के बावजूद राखी का यह त्यौहार हमें आपस में जोड़े रखने का एक सशक्त माध्यम है. भाई-बहन एक ही वट वृक्ष की दो जटायें (लटकती हुई जड़े)है जो अलग-अलग होते हुए भी एक ही है.भाई-बहनों को राखी बांधने के उपलक्ष्य में उपहार देते है.आज हमारी बहने इतनी सक्षम है कि वे भी अपने भाइयों को बड़े से बड़ा उपहार दे सकती है,परन्तु उपहार से ज्यादा महत्व एक दूसरे के प्रति स्नेह है. वस्तुओं का उपहार समय के साथ पुराना हो सकता है, नष्ट हो सकता है, ख़राब हो सकता है.मेरे विचार में, मै अपने सब भाइयों से अनुरोध करूंगा कि वे इस राखी पर क्या हर राखी पर अपनी बहनों को ऐसा उपहार दे जो सालों साल याद रहे. जो पर्यावरण को हरा-भरा और सुरक्षित भी रखे, और आने पीढ़ी को स्वच्छ, प्रदूषण रहित वातावरण दे सके . जिसकी छाया से सभी लाभान्वित हो सके और जिसके फूलों से आसपास का सारा वातावरण महके. वह सुन्दर और अनोखे आकर्षक उपहार एक हरे-भरे छोटे पौधे से बेहतर कुछ नहीं हो सकता.वह भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को और मजबूती प्रदान करेगा. तो सभी भाई अपने बहनों को एक पौधा भेंट करे तथा दोनों मिलकर उसे इस शुभ अवसर पर लगाकर सभी को उसकी छाया से लाभान्वित करने का प्रयास करे. शुभ रक्षा बंधन. नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"
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Thursday, August 19, 2010
आजादी के मायने !
मै,विगत सप्ताह बाहर गया था.पंद्रह अगस्त को सारा देश स्वतंत्रता की ६३वी वर्षगाँठ मना रहा था. मैंने भी मनाई.बड़ा ही सुखद पल था.पंद्रह अगस्त को हमारे मन में एक अलग ही जज्बा होता है.आज़ादी के बाद हमने अपने पडोसी मुल्कों के मुकाबले काफी तरक्की की है.जिस ब्रिटेन के हम गुलाम थे आज उसकी आर्थिक हालत ख़राब है. उसकी विकास दर कम हुई है. पाकिस्तान की आर्थिक हालत किसी से छिपी नहीं है, उसकी विकास दर कम होने के साथ उसकी गिनती आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों में हो रही है. इसके विपरीत भारत के आर्थिक हालत अच्छे हुए है, विकास दर में बढ़ोत्तरी हुई है.विश्व में हमारी ताकत बढ़ी है.आई.टी.क्षेत्र में दबदबा बढ़ा है. अन्तरिक्ष विज्ञानं में हमने बहुत तरक्की की है,जिसका लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है.मेरा ऐसा मानना है कि आर्थिक दृष्ट्या हम ऊँचे उठे है, परन्तु नैतिक रूप से हमारा पतन हुआ है.अंग्रेजो ने हमसे हमारा कुर्ता, पजामा,धोती, साड़ी, टोपी, बंडी,खादी....वगेरह लेकर हमको पेंट, शर्ट, टाई,टी-शर्ट,जींस,बरमूडा, उपभोक्तावाद,व्याव्साईकता, फूट डालो राज करो की नीतियां...आदि विरासत में दी है.हम धीरे-धीरे पाश्चात्य शैली में विकसित होते चले गए है और अब हम न हम अपनी संस्कृति टिका पा रहे है और न पूर्ण रूपेण पाश्चात्य शैली अपना पा रहे है. प्रतिस्पर्धा बुरी बात नहीं है,परन्तु उसकी आड़ मे सत्ता की भूख,अधिक लोलुपता,आवश्यकता से अधिक धन संग्रह,स्वार्थीपन,खुलापन,आपसी वैमनस्यता,भ्रष्टाचार,हमें देश भक्ति से दूर लेकर जा रहा है और हम दिन रात धन कमाने के रास्ते सोचते रहते है.जब हमारा देश ही नहीं रहेगा तो हम क्या करेंगे? शायद हम इस ओर नहीं सोच रहे है, और अपने स्वार्थो की पूर्ती में लगे हुए है. विगत ६३ वर्षों से हम आज़ादी का जश्न मना रहे है, आगे भी मनाएंगे. मैंने लोगो को जश्न मानते देखा है,परन्तु आज ऐसा महसूस होता है कि हम लोग आज़ादी के नाम पर मात्र औपचारिकता निभा रहे है. आज भी स्वतंत्र भारत में एक किशोरी को सरे आम निर्वस्त्र घुमाना,महिला खिलाडियों के साथ दुर्व्यवहार करना, रास्ते पर चलती महिलाओं को अगवा कर उनका बलात्कार करना... क्या यही आज़ादी के मायने है? यह देखकर मन विचलित हो जा जाता है कि क्या हमने आज़ादी इसलिए प्राप्त की है? यह देखकर हमे ऐसा लगता है कि हमारे रणबांकुरों का बलिदान व्यर्थ चला गया है.महारानी लक्ष्मी बाई,तात्या टोपे,सरदार भगतसिंह,चन्द्रशेखरआजाद,राजगुरु,खुदीरामबोस,चाफेकरबंधू,बलवंतफडके...और न जाने कितने वीरों ने अपने खून से सींच कर हमें यह आज़ादी दी है परन्तु हम है की उसको हलके ढंग में ले रहे है और उनके बलिदान को अपमानित कर रहे है.शायद हम लोगो की आत्मा मर चुकी है.चारो और बढ़ता आतंकवाद, नक्सलवाद,अलगाववाद,भ्रष्टाचार,जनसेवको द्वारा सत्ता का दुरुपयोग.. हमें नैतिक पतन की और ले जा रहा है.आज हम स्वतंत्रता का मतलब यह लेते है कि हमें जो करना है हम करेंगे, चाहे उचित हो या अनुचित! हमें नियम तोड़ना अच्छा लगता है और हम अपनी कॉलर पकड़कर कहते है की हम स्वतंत्र है! रेल फाटक बंद होने पर उसके नीचे से निकलना,प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी रेल में शौच करना,चलती बस मे से केले खाकर बाहर फेकना,जलते बीडी-सिगरेट के ठूंठे बिना बुझाये फेकना,नशे की हालत में वाहन चलाना, फुटपाथ पर सोते थके-हारे मजदूरों पर वाहन चढ़ाना,नो-पार्किंग वाले स्थानों पर वाहन पार्क करना,मित्रों के साथ बीच रास्तों पर खड़े होकर बातचीत करना, किसी बुजुर्ग ने टोकने पर चुप रह बुढ्ढे कहना,विवाहों/उत्सवो पर कर्कश ध्वनी में गाने बजाना,पतली प्रतिबंधित पौलीथीन में कचरा भरकर रास्तों पर फेकना,नदियों,तालाबों को प्रदूषित करना,कमजोर वर्ग को कपडे देने के बजाये उसके कपडे उतरवाना,अनुचित रूप से धन कमाना,खाने की वस्तुओं में मिलावट करना,गन्दी राजनीती से लोगो के दिलो को बांटना,रेव्ह पार्टियों में अश्लीलता,मौज-मस्ती करना,वाहनों पर पुरुष मित्रों के साथ दुपट्टा बांधकर असंयमित आचरण करना,बगीचों में युवक-युवतियों द्वारा अमर्यादित व्यव्हार त्योहारों पर भोंडे नृत्यों का प्रदर्शन करना.... आदि. अंत में कहना चाहूँगा कि एकघडी,आधी घडी, आधी से पुनि आध, नेता संगत "भाई" की करे कोटि अपराध.यह इंगित करता है कि स्वतंत्रता या आज़ादी के यही मायने है!
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"
Wednesday, August 11, 2010
क्या सोचेंगे..तिलक जी !
"स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्धअधिकारहै."उक्तवाक्यांश लोकमान्यबाल गंगाधर तिलक जी द्वारा कहे गए थे.अगस्त की पहली तारीख को उनकी नब्बेवी पुण्यतिथि थी .जिनका स्मरण विभिन्न समाचार पत्रों द्वाराकिया गया है,परन्तु मुझे ऐसा लगता है की वो भी शायद मित्रता दिवस की आंधी में उड़ गया.तिलक जी को स्वर्ग में बैठे- बैठे आत्मग्लानी हो रही होगी जब उन्होंने देखा होगा की उनके वाक्यांशों का आज अक्षरशः पालन किया जा रहा है,वो भी उनकी कर्मभूमि पुणे नगरी में जहाँ लगभग साढ़े तीनसो युवक युवतियों,जो की एक दूसरे को अपना मित्र कहते है,"फ्रेंडशिप डे" मनाते है वो भी पूरी स्वतंत्रता के साथ जहाँ नशा खोरी, मौज मस्ती के सारे इंतजाम थे. तिलक जी ने सपने में भी न सोचा होगा कि सालों बाद युवा पीढ़ी उनके शब्दों को इस प्रकार समझेगी. आज हम वैश्विक बाजारवाद, उपभोक्तावाद और भौतिकता के मकडजाल में इस तरह से उलझ गए है कि हम अपना सब कुछ भूलकर प्रतिदिन एक नया "डे" मानते है जो कही से इम्पोर्टेड है.मुझे याद है बचपन में हम बाल दिवस, शिक्षक दिवस,शाला में गुरुपूर्णिमा दिवस.. आदि मानते थे ,परन्तु पाश्चात्यीकरण की "लैला" ने हमको ही हमारे माता-पिता याद को करना सिखा दिया और हम आज बड़े शौक से मदर्स डे, फादर्स डे मानते है. उनको बड़े- बड़े होटलों में ले जाकर पार्टियाँ करते है,पेपरों में फोटो छपवाते है.परन्तु उनका सम्मान करने,चरण छूने में, उनको उनकी वृद्धावस्था में घर में रखने में शर्म महसूस करते है और फिर "बागवान" की याद ताज़ा कर देते है.कहने का अर्थ यह है कि हम लोग औपचरिकता में ज्यादा विश्वास करने लगे है.विश्व में भारत वर्ष एक मात्र ऐसा देश है जहाँ व्यापार की अपार सम्भावनाये है. यहाँ कुछ भी बेचो, बिकता है, फिर वह टैटू, वे ब्लेड, फ्रेंडशिप बेल्ट,आदि क्यों न हो.यहाँ की आबादी इतनी है कि यदि आबादी का कम से कम एक परसेंट सामान भी बिकता है तो भी वो लोग फायदे में होंगे.आज हमारे तीज-त्यौहार मात्र औपचारिकता निभा रहे है और मदर्स डे, फादर्स डे,वेलेंटाइन डे,फ्रेंडशिप डे.... और न जाने क्या-क्या!मजे की बात यह है कि विदेशी सभ्यता में राखी को सिस्टर्स डे करके कभी नहीं मनाते. आज बड़ी हास्यास्पद बात यह है चाइना द्वारा हमारे बाज़ार में उतारा गया माल खूब बिक रहा है और "डे' मानाने की प्रथा ने तो उनकी चांदी कर दी है. आज हमारे बच्चे भी हमारे नहीं रहे,वो भी खाने में चाइनीज़ पसंद करने लगे है. मुझे कुछ दिनों पहले एक एस.एम.एस.आया, जिसमे लिखा था कि मुंबई में आई.सी.एस.सी.की छटवी कक्षा की सोशल साइंस की किताब के ६४ -६५ वे पन्ने में शहीद भगत सिंग,राजगुरु एवं सुखदेव को आतंकवादी कहा गया है, यदि ये सही है, तो हम सबके लिए और स्वतंत्र भारत के लिए एक शर्म की बात है, जहाँ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को आतंकवादी कहा गया है.ये देखकर तिलक जी क्या सोच रहे होंगे? क्या यह चिंता का विषय नहीं है ?आज शायद हम लोगो को आत्म मंथन करने की आवश्यकता है.हमारे स्वतंताता संग्राम सेनानियों को याद करने की, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमको आज़ादी दिलाई. उनके नाम से यदि "डे" मनाये तो तीन सौ पैंसठ दिन भी कम पड़ जायेंगे.व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ने बाज़ार में ऐसी ऐसी वस्तुए,खिलौने निकाले हैजो लगातार पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे है और हम है की "डे" के नाम पर उसका अंधाधुन्द प्रयोग कर रहे है.मित्रता में त्याग होता है स्वार्थ नहीं. सही मायने में यदि स्वार्थ है तो मित्रता नहीं और मित्रता है तो स्वार्थ नहीं. पुणे की फ्रेंडशिप सेलिब्रेशन क्या थी मेरी समझ में नहीं आई. .में तो यही कहूँगा की अब तो जागें और अपने कृत्यों से बड़ो को न लजाये.
नितिन देसाई
नितिन देसाई
Thursday, August 5, 2010
वृक्ष लगाओ,जन्मदिन मनाओ
वृक्ष पालोगे तो सुख मिलेगा.
वृक्ष हमारा दाता है,
हवा छाया औषधि दिलाता है.
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"
Friday, July 23, 2010
आस-पास की प्रकृति
माखनलाल की सलाह !
अरी... सोनू की मम्मी, सुनती हो... क्या है ? अरे अपने कंप्यूटर में कीड़ो, वर्म आ गया है.आप भी.. सोनू के पापा..वर्म तो पेट में होते है और कीड़े तो दांत में लगते है,तो फिर अपने कंप्यूटर में कैसे लग गये? अरी भागवान..तू तो इतना भी नहीं समझती कि"कीड़ो और वर्म "एक तरह के वायरस है,जो कंप्यूटर को ख़राब करते है.ठीक उस तरह से जैसे बैक्टीरिया मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसे इन्फेक्टेड करके बीमार बना देते है, वैसे ही ये हमारे कंप्यूटर महाशय को भी ख़राब कर देंगे. समझी न...आप तो बस दिन भर..ऑफिस में भी कंप्यूटर और घर आने पर भी कंप्यूटर. लगता है मेरी सौत को ले आये है. .. पड़ोस वाले माखनलाल जी को देखो कितने मजे की नौकरी कर रहे है और घर पर भी समय देते है.वो तो बड़े आराम से सुबह ग्यारह बजे दफ्तर के लिए निकलते है और फिर दोपहर का खाना खाने के लिए जो घर आते है, तो फिर तो तीन बजे से पहले नहीं जाते, और तो और शाम को छै बजे से पहले घर भी आ जाते है.आप ही है,जो सुबह आठ बजे जो निकलते हैं तो सीधे रात आठ बजे से पहले नहीं लौटते.अरी..अपने माखनलालजी तो सरकारी कर्मचारी है, मैं तो प्राईवेट में काम करता हूँ. अगर ऐसा करूंगा तो हमेशा के लिए घर पर ही नजर आऊंगा.अपने माखनलालजी की तो बात ही निराली है. क्यों? अरी.. उनकी चारों अंगुलियाँ घी में है और सर कढ़ाई में! ऐसा क्यों? तुम इतना भी नहीं समझती कि सरकारी नौकरी किस्मत वालों को मिलती है!उन्हें नौकरी से कोई नहीं निकाल सकता जब तक की वे चोरी न करें..अथवा रिश्वतखोरी..में न फंसे.मै तो हुक्म का ताबेदार हूँ,मौखिक आदेश पर फटाफट काम निपटाता हूँ फिर भी चौबीसों घंटे मेरे सर पर तलवार लटकी रहती है कि कब सेठ गुड बाय कह दे.
एक दिन मै किसी कारण से घर जल्दी आ गया. घर बंद था, तभी माखनलाल जी ने मुझे बुलाया और कहा,जब तक भाभी जी आती है,गरमा- गरम एक कप चाय पीते है. मैंने मन-ही-मन सोचा की आज अपने भाग खुल गये! मैंने पूछा.. कैसे चल रहा है? उन्होंने तपाक से कहा..बने रहो पगला, काम करेगा अगला.मैंने पूछा, यह क्या बडबडा रहे हो? उन्होंने कहा.. बडबडा नहीं हकीकत बयां कर रहा हूँ! सरकारी तंत्र में नौकरी करना एक कला है वो हरेक के बस की बात नहीं है. मैंने पूछा क्यों?बोले भैया.., जैसे दादाओं के,डाकुओं के, डान के फील्ड के कुछ उसूल और काम करने के तरीके होतें है,वैसे ही सरकारी तंत्र में सुचारू रूप से काम करने के अपने तरीके होतें है.जहाँ नियमानुसार,पारदर्शितापूर्वक,बिना जल्दबाजी मचाये,लखित रूप में ही काम किया जाता है,चाहे वो कितना ही अर्जेंट क्यों न हो? चाहे किसी को पसंद आये या न आये.भैया.. उस शैली में काम किया तो जिंदगी आराम से कटती है और पेंशन भी पक्की. जरा सी हुशियारी दिखाई तो बॉस आपकी सी. आर. को लड़ैया बना देगा. फिर प्रमोशन तो दूर की बात और यदि किसी केस में फंस गए तो फंड,पेंशन सब जब्त.. जब तक फैसला न हो जाये.वैसे भी वहां प्रमोशन काबिलियत से नहीं, सीनियरिटी कम फिटनेस के आधार पर होते है,प्राइवेट जैसे नहीं."चट मंगनी पट ब्याव, नहीं पटा तो यहाँ से जाओ." माखन लाल ने चाय की एक लम्बी फुरकी ली और कहा एक सर्वे के अनुसार सरकारी दफ्तरों में लगभग चालीस प्रतिशत लोग ही सकारात्मक सोच एवं प्रवृत्ति रखतें है और ये लोग ही नकारात्मक सोच वालों को ढकते है.यदि नकारात्मक सोच वाले लोग अपनी सोच एवं प्रवृत्ति बदलें तो देश कितना आगे बढेगा,पर ये लोग है कि अपनी सोच, प्रवृत्ति एवं प्रकृति बदलने को तैयार ही नहीं. ये ही लोग वर्किंग एन्विरौन्मेंट को प्रदूषित करते है.उनका अपना अलग फंडा है "काम कर न कर, काम की फिक्र जरूर कर, फिक्र कर और उसका अपने साहब जिक्र जरूर कर,जिक्र तो कर पर काम करने वाले को उंगली कर,वो भी बदल-बदल के कर,उसकी चुगली बड़े अफसर से कर,फिर भी मन न माना तो एक ही चुगली,अफसर बदल के कर." भैया माखन लाल मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है.. खैर तुम्हे कुछ समझ में भी नहीं आयेगा.आगे बताता हूँ.. ये लोग बड़े ऊँचे दर्जे के होते है.ये टेंशन लेते नहीं बल्कि दूसरों को टेंशन देते है. टेंशन देकर पेंशन लेते है.इनका मुख्य फंडा होता है. "पालोगे टेंशन,तो बीबी उठाएगी पेंशन, भाड़ में जाये जनता,अपना काम बनता. देते रहो डोनेशन,पाते रहो प्रमोशन" इसके पहले कि साहब इनके लिए सरदर्द बने,ये लोग साहब के लिए सरदर्द बन जाते है.. ये लोग दूसरों को गाना सुनाते है, सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है.. पर इनका खुदा तो कार्यालय में कार्यालय का साहब होता है,सचिवालय में सचिव और मंत्रालय में मंत्री!भैया यदि इन्हे बाबूलाल..जैसा अधिकारी मिल जाये,जो नये प्रतिभावान इंजिनीयर से भी मशीन के नट-बोल्ट गिनवाने जैसे काम में यकीन रखता है.तो बेचारा इंजिनीयर..हाथ की मुट्ठी भीचकर,दांत दबाकर,मन मसोस कर चला जाता है.मन ही मन बडबडाता,गलियां बकता है,साला.. मेरा भी दिन आयेगा! ये रिटायर होगा तो दिखाऊंगा.यदि आपने,साहब को दिमाग दिया तो बोलेगा "फॉलो माय इंस्ट्रक्शन".. ऐसे वक्त ये लोग,बड़ी धूर्तता से अपना पैंतरा बदल लेते है,और साहब के करीब हो जाते है. ये लोग अपना डिग्री,डिप्लोमा और हुशियारी,कार्यालय में घुसते समय बाहर बैठे सिक्युरिटी गार्ड के पास रखकर आते है और घर वापस जाते समय लेकर जाते है.कहते है सबसे बड़े साब के चपरासी, ड्राइवर और पी.ऐ.से कभी पंगा मत लो. काम धेले भर का मत करो सिर्फ यस सर-यस सर करो आने जाने का टाइम मेंटेन करो तो रामपाल जैसा आदमी भी द्वारपाल का काम नहीं कर पायेगा. ऐसे में तो काम भी फिट और दाम भी फिट. भैया... माखन लाल तुमने तो बहुत ऊँची- ऊँची दे दी. मेरे तो ऊपर से निकल गई.चलो समझाए देता हूँ सुनो.. ..
एक दिन मै किसी कारण से घर जल्दी आ गया. घर बंद था, तभी माखनलाल जी ने मुझे बुलाया और कहा,जब तक भाभी जी आती है,गरमा- गरम एक कप चाय पीते है. मैंने मन-ही-मन सोचा की आज अपने भाग खुल गये! मैंने पूछा.. कैसे चल रहा है? उन्होंने तपाक से कहा..बने रहो पगला, काम करेगा अगला.मैंने पूछा, यह क्या बडबडा रहे हो? उन्होंने कहा.. बडबडा नहीं हकीकत बयां कर रहा हूँ! सरकारी तंत्र में नौकरी करना एक कला है वो हरेक के बस की बात नहीं है. मैंने पूछा क्यों?बोले भैया.., जैसे दादाओं के,डाकुओं के, डान के फील्ड के कुछ उसूल और काम करने के तरीके होतें है,वैसे ही सरकारी तंत्र में सुचारू रूप से काम करने के अपने तरीके होतें है.जहाँ नियमानुसार,पारदर्शितापूर्वक,बिना जल्दबाजी मचाये,लखित रूप में ही काम किया जाता है,चाहे वो कितना ही अर्जेंट क्यों न हो? चाहे किसी को पसंद आये या न आये.भैया.. उस शैली में काम किया तो जिंदगी आराम से कटती है और पेंशन भी पक्की. जरा सी हुशियारी दिखाई तो बॉस आपकी सी. आर. को लड़ैया बना देगा. फिर प्रमोशन तो दूर की बात और यदि किसी केस में फंस गए तो फंड,पेंशन सब जब्त.. जब तक फैसला न हो जाये.वैसे भी वहां प्रमोशन काबिलियत से नहीं, सीनियरिटी कम फिटनेस के आधार पर होते है,प्राइवेट जैसे नहीं."चट मंगनी पट ब्याव, नहीं पटा तो यहाँ से जाओ." माखन लाल ने चाय की एक लम्बी फुरकी ली और कहा एक सर्वे के अनुसार सरकारी दफ्तरों में लगभग चालीस प्रतिशत लोग ही सकारात्मक सोच एवं प्रवृत्ति रखतें है और ये लोग ही नकारात्मक सोच वालों को ढकते है.यदि नकारात्मक सोच वाले लोग अपनी सोच एवं प्रवृत्ति बदलें तो देश कितना आगे बढेगा,पर ये लोग है कि अपनी सोच, प्रवृत्ति एवं प्रकृति बदलने को तैयार ही नहीं. ये ही लोग वर्किंग एन्विरौन्मेंट को प्रदूषित करते है.उनका अपना अलग फंडा है "काम कर न कर, काम की फिक्र जरूर कर, फिक्र कर और उसका अपने साहब जिक्र जरूर कर,जिक्र तो कर पर काम करने वाले को उंगली कर,वो भी बदल-बदल के कर,उसकी चुगली बड़े अफसर से कर,फिर भी मन न माना तो एक ही चुगली,अफसर बदल के कर." भैया माखन लाल मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है.. खैर तुम्हे कुछ समझ में भी नहीं आयेगा.आगे बताता हूँ.. ये लोग बड़े ऊँचे दर्जे के होते है.ये टेंशन लेते नहीं बल्कि दूसरों को टेंशन देते है. टेंशन देकर पेंशन लेते है.इनका मुख्य फंडा होता है. "पालोगे टेंशन,तो बीबी उठाएगी पेंशन, भाड़ में जाये जनता,अपना काम बनता. देते रहो डोनेशन,पाते रहो प्रमोशन" इसके पहले कि साहब इनके लिए सरदर्द बने,ये लोग साहब के लिए सरदर्द बन जाते है.. ये लोग दूसरों को गाना सुनाते है, सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है.. पर इनका खुदा तो कार्यालय में कार्यालय का साहब होता है,सचिवालय में सचिव और मंत्रालय में मंत्री!भैया यदि इन्हे बाबूलाल..जैसा अधिकारी मिल जाये,जो नये प्रतिभावान इंजिनीयर से भी मशीन के नट-बोल्ट गिनवाने जैसे काम में यकीन रखता है.तो बेचारा इंजिनीयर..हाथ की मुट्ठी भीचकर,दांत दबाकर,मन मसोस कर चला जाता है.मन ही मन बडबडाता,गलियां बकता है,साला.. मेरा भी दिन आयेगा! ये रिटायर होगा तो दिखाऊंगा.यदि आपने,साहब को दिमाग दिया तो बोलेगा "फॉलो माय इंस्ट्रक्शन".. ऐसे वक्त ये लोग,बड़ी धूर्तता से अपना पैंतरा बदल लेते है,और साहब के करीब हो जाते है. ये लोग अपना डिग्री,डिप्लोमा और हुशियारी,कार्यालय में घुसते समय बाहर बैठे सिक्युरिटी गार्ड के पास रखकर आते है और घर वापस जाते समय लेकर जाते है.कहते है सबसे बड़े साब के चपरासी, ड्राइवर और पी.ऐ.से कभी पंगा मत लो. काम धेले भर का मत करो सिर्फ यस सर-यस सर करो आने जाने का टाइम मेंटेन करो तो रामपाल जैसा आदमी भी द्वारपाल का काम नहीं कर पायेगा. ऐसे में तो काम भी फिट और दाम भी फिट. भैया... माखन लाल तुमने तो बहुत ऊँची- ऊँची दे दी. मेरे तो ऊपर से निकल गई.चलो समझाए देता हूँ सुनो.. ..
माखन नाम है मेरा,माखनलाल,
पतली कर देता हूँ सबकी दाल,
मनो मेरी सलाह तो कट जाये सालों साल,
गर लगाया अपना दिमाग तो हो जाओगे बेहाल.
ठीक है भैया,चलता हूँ और तुम्हारी सलाह लापतागंज में मिस्टर एंड मिसेस शर्मा इलाहाबादवाले को भिजवा देता हूँ.
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"
ठीक है भैया,चलता हूँ और तुम्हारी सलाह लापतागंज में मिस्टर एंड मिसेस शर्मा इलाहाबादवाले को भिजवा देता हूँ.
नितिन देसाई "पर्यावरण मित्र"
Sunday, July 11, 2010
अब लौकी बेचारी क्या करे !
कुछ (एक-दो) दिन पहले मैंने एक निजी चैनल पर समाचार देखा कि एक वैज्ञानिक की लौकी के जूस पीने से मौत हो गई,और उनकी पत्नी की हालत गंभीर थी तथा उनका इलाज चल रहा था.सुनकर ख़राब लगा. सर्वप्रथम मै पीड़ित परिवार के प्रति सहानूभूति व्यक्त करता हूँ और परमपिता परमेश्वर से उनकी आत्मा की शांति हेतु प्रार्थना करता हूँ.खबर वाकई विचलित कर देने वाली थी,पर अब बिचारी लौकी का क्या दोष! जो लोग एकदम उसके पीछे ही पड़ गये.असल हमारे किसानो को हरित क्रांति के बादसे पैदावार बढाने का चस्का जो लग गया है, वो खेतों में रासायनिक खाद,कीड़ों को मारने हेतु जहरीली दवाओं का छिडकाव करते है तथा साइज़ बढाने के चक्कर में इंजेक्शन भी लगाते है. लौकी बेचारी तो एकदम भोंदू की तरह है उसमें उत्तम गुण होते हुए भी बरसों से मरीजों के सिवाय उसको कोई नहीं पूछता था.यदि कोई डिब्बे में लौकी की सब्जी लाये तो उसे यह सुनने को मिलता था की यह तो मरीजों का खाना है.पनीर-शनीर क्यों नहीं लाये? सब उसकी खिल्ली उड़ाते थे.यह तो बाबा रामदेव की कृपा है,जिसने उसको सबका चहेता बना दिया, और उसका मान भी बढ़वा दिया,वरना जब वैद्यराज जी लौकी खाने को कहते तो अच्छे-अच्छे लोग नाक-भों सिकोड़ने लगते कि कब इससे पिंड छूटेगा,लेकिन अब तो पिंडदान के समय भी लौकी को बाजू में रखने कि नौबत आ गई है!गुणधर्म में तो लौकी पहले जैसी थी वैसे आज भी है परन्तु अब तो वो लोगों की इतनी प्यारी हो गई है कि पार्टियों में हलुए के रूप में भी दिखाई देती है,मधुमेह वाला भी इसे बड़े चाव से खाता है तथा बाद में बाबा रामदेव कि जय बोलकर एक टेबलेट भी खा लेता है.इस ससुरी चटोरी जीभ ने उसकी कीमत जो बढ़ा दी है.यह जीभ या तो कैची कि तरह चलेगी या फिर चटोरों का साथ देगी.आज अधिकतर लोगो को मधुमेह से पीड़ित कराने में इस चटोरी जीभ का बहुत बड़ा योगदान है, जो नित नये व्यंजनों को चखने में बेकाबू हो जाती है और परिणाम मनुष्य को भोगना पड़ता है.मनुष्य है जो खाने पर नियंत्रण रखने को तैयार नहीं,चाहे फिर गोली क्यों न खानी पड़े.सर में दर्द पर दर्द निवारक गोली खायेगा,एसिडिटी बढ़ने पर एंटासिड खायेगा पर बुद्धिजीवी होने के नाते यह विचार नहीं करेगा कि सर दर्द क्यों? एसिडिटी क्यों?अपने शास्त्रों में कहा गया है कि ज्यादा आम खाने पर चार जामुन खाले,ज्यादा जामुन खाने पर एक आम खाले, असल में आम मीठा होता है और अम्लता निर्माण करता है तथा जामुन कसैला होता है वो आम के अफरे को दूर करता है.कहने का तात्पर्य यह है कि सिस्टम को प्राकृतिक रूप से बेलेंस करें.एक और कहावत है कि क्वांर,कार्तिक,करेला दही,मरो नहीं,तो पड़ो सही.सैकड़ो वर्षों पूर्व लिखी गई ये पंक्तियाँ एकदम सटीक है,परन्तु आदमी है की मनाता ही नहीं.उसकी जीभ उसे ललचाये रहती है.वैसे किसी भी फल का ताज़ा रस फायदा करता है, निकलकर देर तक रखा हुआ नहीं.शास्त्र के अनुसार कड़वा रस रेचक का कार्य करता है,जो पेट साफ करने में सहायक होता है.अतःकिसी भी फल का रस पीने के पूर्व उसके कडवेपन की जाँच अवश्य कर लेना चाहिये अन्यथा परिणाम हम देख चुके है.बरसों पहले ऐसी ही एक घटना मेरे एक मित्र के साथ घट चुकी है. भाई साहब बाबा रामदेव के नियमित प्रवचन सुना करते थे.वे उनसे प्रभावित थे.उन्होंने लौकी के रस का नियमित सेवन करना प्रारम्भ कर दिया था.एक दिन राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर उन्हें झंडा वंदन को जाना था. भाई साहब ने लौकी का रस निकाला और रख दिया. फिर वे झंडा वंदन के लिए चले गये. वहां से आकर उन्होंने रस पिया और फिर दूसरे कार्यक्रम के निकालने वाले थे कि एकाएक पेट में गड़बड़ शुरू हो गई. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया.उनसे पूछने पर पता चला कि जल्दबाजी में उन्होंने खाली पेट लौकी का रस पिया था,जो कि कडवा था.खैर भाई साहब तो बच गये पर कड़वी लौकी हमेशा के लिये असर कर गई.मुझे वह कहावत याद आती है, "अब पछतावत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत." बहन लौकी हमें सीख देती है कि पहले अपनी तासीर को समझो फिर उपयोग किये जाने वाले पदार्थ के गुणधर्म को समझो तत्पश्चात ही उसे अपनाओ अन्यथा परिणाम गंभीर होंगे?जिसे बाबा ने हीरो बनाया उसे हम नासमझी में जीरो बनाने पर तुले है. तभी तो बेचारी लौकी कहने को मजबूर है कि गरीब कि लुगाई, सब कि भौजाई. मेरा क्या कसूर? मै क्या करूं.आप स्वयं ही सुधर जाइये!
Wednesday, June 30, 2010
" नहीं होती तो क्यों रिसती "
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दिसम्बर का महिना कडकडाती ठण्ड, चरों तरफ सन्नाटा, आधी रात का समय लोग अपने -अपने घरों में ... कि अचानक भोंपू की आवाज़ आती है और आसपास के लोग
अपने-अपने घरों से निकलकर आगे की तरफ भागते हैं, उन्हें लगता है की आग लग गई है. पहुँचाने पर पता चलता है कि आग नहीं गैस रिसी है. वापस मुड़कर लोगों का जत्था अपने-अपने घरों की और लौटने लगता है कि उन्हें महसूस होता है जैसे किसी ने उनका गला दबा दिया हो, आँखों में जलन,फेफड़ों में कसाव इसके साथ ही,एक-एक करके गिरते जाना.जो कोई भी उसके रास्ते में आया उसने उन सबको अपने आगोश में ले लिया और बदले में दी चिर निद्रा. यह सिलसिला चलता रहा और अंत मौत.जो सायरन बजने वाली चार दिवारी में थे बच गए.यह कोई नत्जियों पर फिल्माई गई चित्रपट का दृश्य नहीं अपितु वीभत्स और रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई थी. आप समझ ही गए होंगे की मैं किस मंजर की बात कर रहा हूँ. मात्र आधे घंटे में चालीस टन गैस का रिसना कई त्रुटियों की तरफ इशारा करता है.
इस तांडव रुपी घटना को छब्बीस वर्ष बीत गए जो उस गैस के संपर्क में आये वो तो काल के गाल में समां गए और जो बच गए वो भी अपंगता से नहीं बच पाए, जिनमें थोड़ी बहुत भी जीने की आस थी वो तो न्याय सुनाने के बाद खत्म हो गयी. इसको हम बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों की दादागिरी कहें या सरकार की लाचारी या फिर हमारे कानून का अत्यधिक लचीलापन, जो न तो पीड़ितों को न्याय दे पाया और न ही एंडरसन जैसों को सजा दे पाया, इसे हम अपनी विवशता कहें या हमारा दब्बूपन! ऐसा लगता है हमारी सरकार,हमारा कानून मजबूर प्रतीत होता है. जहाँ कानून द्वारा सजा दिए जाने के बाद भी अफजल गुरु जैसे आतंकियों की सजा को अमल में लाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है तो भोपाल के केस में हम लोगों के द्वारा न्याय की उम्मीद रखना हमारी एक बड़ी भूल थी,क्योंकि जब हमारे ही मंत्री,संत्री ही एंडरसन जैसों की खिदमत में लगे हों, और जनता का दर्द सत्ता के गलियारों, रसूखदारों के बीच में मात्र तमाशा बन कर रह गया. लगता है हम वैश्विक स्तर पर न्यायवान होते हुए भी क्षमाशील दिखाए दिए! मुझे क्षेत्रीय श्रम संस्थान,कानपूर से औद्योगिक सुरक्षा ( Industrial Safety) में Post Diploma करने का अवसर मिला वहां मुझको विश्व प्रसिद्ध दुर्घटनाओ के बारे में पढ़ने का एवं तकनीकी रूप से दुर्घटनाओ के कारणों के बारे में जानने का अवसर मिला जिसमें भोपाल गैस त्रासदी भी एक थी. विभिन्न पुस्तकों, लेखों, पत्रों, शोधों की जानकारियों के अनुसार जो कारन सामने आये उनके अनुसार "दुर्घटनाएं घटित नहीं होती ,अपितु कारणीभूत होती हैं" भोपाल गैस त्रासदी के भी अनेक कारण हो सकतें हैं, परन्तु प्रारंभिक तौर पर मुझे जो कारण समझ में आये वो एस प्रकार हैं -
मानवीय भूल
उपकरणों का ख़राब होना
ख़राब रख-रखाव
लापरवाही एवं दोषपूर्ण संचालन
दोषपूर्ण संरचना आदि है.
असल में भोपाल का यूनियन कार्बाईड सयंत्र वर्ष १९३४ में स्थापित किया गया था, तब वह शहर से एकदम बाहर था. वर्ष१९७०के आसपास कारखाने में पेस्टीसाईड़ इकाई लगे गयी. तब तक कारखाने के आसपास बसाहट बढ़ने लगी थी परन्तु उसे नज़रंदाज़ किया गया. वर्ष १९८४ कारखाने का स्वर्ण जयंती वर्ष था,किसको पता था की ड्राकुला बनकर हजारों लोगो का खून पीकर यह सयंत्र अपनी स्वर्ण जयंती मनायेगा. भोपाल सयंत्र में "कार्बरिल " नामक कीटनाशक बनाया जाता था. आज हम उसे मानव नाशक कह सकते है. सयंत्र में "कार्बरिल " पयरोलिसिस क्रिया द्वारा बनाया जाता था, जिसमे मोनो मिथाईल अमीनऔर फास्जीन गैस की क्रिया कराने से मिथाईल आईसो साइनेट (एम्. आई. सी.) अंतर मध्यीय उत्पाद के रूप में बनती है, जो गैस और द्रव दोनों अवस्थाओं में अत्यंत विषैली,पानी के साथ अत्यंत क्रियाशील होती है.
एम्. आई. सी को
सयंत्र में उसे बड़ी -बड़ी टंकियो जिसे हम वहां बुलेट कहते है, भरकर राखी जाती थी. मिथाईल आईसो साइनेट की अल्फ़ा नेफ्थाल से क्रिया कराकर अंतिम उत्पाद कार्बरिल बनता है.दुर्घटना वाली रात, सयंत्र में साठ टन के तीन बुलेट भरे हुए थे. दुर्घटना वाली रात, अर्थात दो दिसंबर को सयंत्र में उत्पादन कार्य बंद था और अनुरक्षण कार्य किया जा रहा था. रात्रि लगभग सवा दस बजे कार्य पर उपस्थित पाली पर्यवेक्षक द्वारा ऑपरेटर से टेंक नंबर ६१० की पाईप लाइन धोने को कहा.रात्रि कालीन नए ऑपरेटर ने लगभग ग्यारह बजे अपनी आँखों में जलन महसूस की, परन्तु उसने इसे यह सोचकर नज़रंदाज़ किया की इस तरह की जलन होना आम बात थी. उसने मध्य रात्रि यह पाया की टेंक में ताप व दाब दोनों लगातार बढ़ रहे है. उसने यह सोचा कि हो सकता है शायद ताप -दाब मापी घडी का कांटा सही नाप नहीं बता रहा है,अतः उसने इसे हल्क़े में लिया. लगातार बढ़ते ताप व दाब के कारण रप्चर डिस्क फट गई और सेफ्टी वाल्व उड़ गया तथा रनवे रिएक्शन प्रारंभ हो गया. रनवे रिएक्शन की यह खास बात है की वह एक बार यदि प्रारंभ हो जय तो उसे रोकना अत्यंत कठिन कार्य है. उक्त टेंक में भरी मिथाईल आईसो साइनेट (एम्. आई. सी.) अर्थात " मिक " गैस दिसंबर की कडकडाती ठण्ड में ३३ मी. ऊँची मीनार से भोपाल शहर की हवा में फ़ैल गई. दुर्भाग्य से उस दिन हवा का रूख शहर की तरफ ही था. उसके बाद तो जो हुआ वो सभी ने देखा, जाना और आज भी जान रहे है. भोपाल का नाम हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो में भयानक औद्योगिक त्रासदी के लिए अमर हो गया.
अब हम इसे मानवीय भूल कहें या दोषयुक्त कार्य प्रणाली, क्योंकि पाईप में पानी पड़ने पर टेंक के अन्दर जाना और लगातार ताप-दाब में वृद्धि को नज़र अंदाज़ करना समझ में नहीं आता . दूसरा कारखाने में लगाये गए पांचो सेफ्टी सिस्टम जिसमें,
१. वेंट गैस स्क्रबर
२. फ्लेयर स्टेक टावर
३. वाटर कर्टेन
४. रेफ्रिजरेशन सिस्टम
५. स्पेयर स्टोरेज टेंक
होने के बावजूद अपनी कसौटी पर खरे नहीं उतरे. विभिन्न रिपोर्टों एवं जानकारी के अनुसार - स्क्रबर में कास्टिक सोडे द्वारा गैस को प्रभावहीन बनाया जाता था, परन्तु दुर्घटना के समय स्क्रबर सुधार कार्य में था. फ्लेयरस्टेकटावर में स्वचालित रूप से विषैली गैसों को हवा में जलाने का कार्य किया जाता था परन्तु दुर्घटना के समय इस टावर की पाईप लाइन में सुधार कार्य किया जा रहा था. वाटरकर्टेन यह वह पद्धति है जिसमें संवेदनशील क्षेत्रों में पानी के फौव्वारों द्वारा हवा में विसरित गैसों(यहाँ मिक ) को पानी में घोलकर डाई मिथाईल यूरिया अथवा ट्राई मिथाईल ब्युरेट बनाया जाता था परन्तु दुर्घटना के समय पानी के फौव्वारे चालू होने के बावजूद तीस मीटर की ऊँचाई तक पहुँच नहीं सके. रेफ्रिजरेशन सिस्टम, जो टेंक के अन्दर -१० से -१५ डिगरी सेंटीग्रेड तक के तापमान को बनाये रखने के लिए तीस टन क्षमता का रेफ्रिजरेशन सिस्टम डिज़ाइन किया गया था परन्तु दुर्घटना के समय वह चालू नहीं किया गया था. स्पेयर स्टोरेज टेंक, यह, "मिक" के भण्डारण के लिए साठ टन के तीन अतिरिक्त टेंकों की व्यवस्था की गयी थी परन्तु दुर्भाग्य से उस दिन उसमेंसे एक भी टेंक खली नहीं था. जब टेंक ६१० में दाब बढ़ा तो उसे दूसरे टेंक में स्थानांतरित किया जा सकता था. अब इसे लापरवाही कहें या दुर्भाग्य की घटना के समय वो सभी पहले से ही भरे हुए थे. यहाँ यह कहना सर्वथा उचित होगा की गैस थी इसलिए तो रिसी, नहीं होती तो क्यों रिसती. यह जानने के बाद मेरे दिमाग में क्या कोई भी सामान्य आदमी के दिमाग में प्रश्न उठाते है जैसे - जब कारखाने में उत्पादन कार्य बंद था तो १८० टन मिक गैस का भण्डारण उचित था? उसका अंतिम उत्पाद कार्बरिल क्यों नहीं बनाया गया ? क्या कारखाने वाले सभी मिक की तासीर से अनभिज्ञ थे?
ऐसा नहीं है कि कारखाना प्रबंधन और सरकार दोनों अच्छी तरह से कारखाने के बारे में नहीं जानते थे. भोपाल हादसे से पहले स्थानीय पत्रकारों द्वारा कई बार स्थानीय समाचार पत्रों में कारखाने सम्बन्धी प्रश्न उठाये गए थे परन्तु ऐसा लगता है जैसे उसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया अन्यथा यह दिन नहीं देखना पड़ता. प्राप्त जानकारी के अनुसार सन १९७५ तक कारखाने के चारों और काफी बसाहट हो चुकी थी. उस समय तत्कालीन भोपाल प्रशासक द्वारा कारखाने को कही अन्यत्र स्थानांतरित करने हेतु प्रयास किया था, परन्तु वे यशस्वी नहीं हो सके. सन १९८२ के लगभग कारखाने को लेकर में मध्यप्रदेश विधानसभा में भी प्रश्न उठाया गया. सरकार की तरफ से तत्कालीन श्रम मंत्री द्वारा इसका जवाब विधानसभा में दिया था और बताया गया था की कारखानें में सफेटी सम्बन्धी पूरी व्यवस्था है. कारखाने को कहीं अन्यत्र ले जाना कोई हंसी खेल नहीं है और भोपाल को कोई खतरा नहीं है. कारखाने को कहीं अन्यत्र ले जाना कोई हंसी खेल नहीं है और भोपाल को कोई खतरा नहीं है. ऐसे में यह बात तो सर मुंडाते ही ओले पड़े जैसी हुई. ऐसे में आज इस हादसे ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है की हमने इससे क्या सीखा ?
१.सभी देशों के नागरिकों की जिंदगी को समान रूप से आंकना चाहिए. जबकि होता यह है कि विकसित देश, विकासशील देशों के नागरिकों को दुह्यम दर्जे के रूप में आंकते है. हम भारतीयों की जिंदगी तो सस्ती, सुन्दर और टिकाऊ समझी जाती है.
२. विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में समान उपकरण और समान ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं लगाये जाते, जबकि उसमें एकरूपता होनी चाहिए.
३. विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में कारखाने की कार्यप्रणाली एवं सम्बंधित खतरों को समय -समय पर अवगत कराया जाना चाहिए.
४. विकसित देशों द्वारा जब विकासशील देशों में कारखाने लगाये जाते हैं तो उनकी जवाबदेही अधिक होनी चाहिए. भोपाल के केस में तो यूनियन कार्बाईड ने अपना पल्ला बड़ी खूबसूरती से झाड़ लिया.
५. स्टाफ एवं कर्मचारियों को समय-समय पर सेफ्टी सम्बन्धी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए.
६. विकसित देशों में एम.आई.सी. का भण्डारण बड़े-बड़े ड्रमों में किया जाता है तत्पश्चात उसे अलग भवन में रखा जाता है जिसके ऊपर स्वचालित फौव्वारों द्वारा पानी का छिडकाव किया जाता है तथा उसमें गैस डिटेक्टर लगे होते हैं.
७.भोपाल हादसे के बाद फ़्रांस द्वारा उनके यहाँ एम.आई.सी. का आयत बंद कर दिया था.
८. कारखानों के आसपास के लोगो को खतरों और आपातस्थिति के बारे में जानकारी एवं प्रशिक्षण देना चाहिए. जो भोपाल के केस में नहीं दिया गया था.
९. जनमानस को आग लगने का सायरन एवं गैस रिसने का सायरन अलग-अलग है इसके बारे में जानकारी देनी चाहिए. जो भोपाल के केस में नहीं दिया गया था.
अपने-अपने घरों से निकलकर आगे की तरफ भागते हैं, उन्हें लगता है की आग लग गई है. पहुँचाने पर पता चलता है कि आग नहीं गैस रिसी है. वापस मुड़कर लोगों का जत्था अपने-अपने घरों की और लौटने लगता है कि उन्हें महसूस होता है जैसे किसी ने उनका गला दबा दिया हो, आँखों में जलन,फेफड़ों में कसाव इसके साथ ही,एक-एक करके गिरते जाना.जो कोई भी उसके रास्ते में आया उसने उन सबको अपने आगोश में ले लिया और बदले में दी चिर निद्रा. यह सिलसिला चलता रहा और अंत मौत.जो सायरन बजने वाली चार दिवारी में थे बच गए.यह कोई नत्जियों पर फिल्माई गई चित्रपट का दृश्य नहीं अपितु वीभत्स और रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई थी. आप समझ ही गए होंगे की मैं किस मंजर की बात कर रहा हूँ. मात्र आधे घंटे में चालीस टन गैस का रिसना कई त्रुटियों की तरफ इशारा करता है.
इस तांडव रुपी घटना को छब्बीस वर्ष बीत गए जो उस गैस के संपर्क में आये वो तो काल के गाल में समां गए और जो बच गए वो भी अपंगता से नहीं बच पाए, जिनमें थोड़ी बहुत भी जीने की आस थी वो तो न्याय सुनाने के बाद खत्म हो गयी. इसको हम बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों की दादागिरी कहें या सरकार की लाचारी या फिर हमारे कानून का अत्यधिक लचीलापन, जो न तो पीड़ितों को न्याय दे पाया और न ही एंडरसन जैसों को सजा दे पाया, इसे हम अपनी विवशता कहें या हमारा दब्बूपन! ऐसा लगता है हमारी सरकार,हमारा कानून मजबूर प्रतीत होता है. जहाँ कानून द्वारा सजा दिए जाने के बाद भी अफजल गुरु जैसे आतंकियों की सजा को अमल में लाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है तो भोपाल के केस में हम लोगों के द्वारा न्याय की उम्मीद रखना हमारी एक बड़ी भूल थी,क्योंकि जब हमारे ही मंत्री,संत्री ही एंडरसन जैसों की खिदमत में लगे हों, और जनता का दर्द सत्ता के गलियारों, रसूखदारों के बीच में मात्र तमाशा बन कर रह गया. लगता है हम वैश्विक स्तर पर न्यायवान होते हुए भी क्षमाशील दिखाए दिए! मुझे क्षेत्रीय श्रम संस्थान,कानपूर से औद्योगिक सुरक्षा ( Industrial Safety) में Post Diploma करने का अवसर मिला वहां मुझको विश्व प्रसिद्ध दुर्घटनाओ के बारे में पढ़ने का एवं तकनीकी रूप से दुर्घटनाओ के कारणों के बारे में जानने का अवसर मिला जिसमें भोपाल गैस त्रासदी भी एक थी. विभिन्न पुस्तकों, लेखों, पत्रों, शोधों की जानकारियों के अनुसार जो कारन सामने आये उनके अनुसार "दुर्घटनाएं घटित नहीं होती ,अपितु कारणीभूत होती हैं" भोपाल गैस त्रासदी के भी अनेक कारण हो सकतें हैं, परन्तु प्रारंभिक तौर पर मुझे जो कारण समझ में आये वो एस प्रकार हैं -
मानवीय भूल
उपकरणों का ख़राब होना
ख़राब रख-रखाव
लापरवाही एवं दोषपूर्ण संचालन
दोषपूर्ण संरचना आदि है.
असल में भोपाल का यूनियन कार्बाईड सयंत्र वर्ष १९३४ में स्थापित किया गया था, तब वह शहर से एकदम बाहर था. वर्ष१९७०के आसपास कारखाने में पेस्टीसाईड़ इकाई लगे गयी. तब तक कारखाने के आसपास बसाहट बढ़ने लगी थी परन्तु उसे नज़रंदाज़ किया गया. वर्ष १९८४ कारखाने का स्वर्ण जयंती वर्ष था,किसको पता था की ड्राकुला बनकर हजारों लोगो का खून पीकर यह सयंत्र अपनी स्वर्ण जयंती मनायेगा. भोपाल सयंत्र में "कार्बरिल " नामक कीटनाशक बनाया जाता था. आज हम उसे मानव नाशक कह सकते है. सयंत्र में "कार्बरिल " पयरोलिसिस क्रिया द्वारा बनाया जाता था, जिसमे मोनो मिथाईल अमीनऔर फास्जीन गैस की क्रिया कराने से मिथाईल आईसो साइनेट (एम्. आई. सी.) अंतर मध्यीय उत्पाद के रूप में बनती है, जो गैस और द्रव दोनों अवस्थाओं में अत्यंत विषैली,पानी के साथ अत्यंत क्रियाशील होती है.
एम्. आई. सी को
सयंत्र में उसे बड़ी -बड़ी टंकियो जिसे हम वहां बुलेट कहते है, भरकर राखी जाती थी. मिथाईल आईसो साइनेट की अल्फ़ा नेफ्थाल से क्रिया कराकर अंतिम उत्पाद कार्बरिल बनता है.दुर्घटना वाली रात, सयंत्र में साठ टन के तीन बुलेट भरे हुए थे. दुर्घटना वाली रात, अर्थात दो दिसंबर को सयंत्र में उत्पादन कार्य बंद था और अनुरक्षण कार्य किया जा रहा था. रात्रि लगभग सवा दस बजे कार्य पर उपस्थित पाली पर्यवेक्षक द्वारा ऑपरेटर से टेंक नंबर ६१० की पाईप लाइन धोने को कहा.रात्रि कालीन नए ऑपरेटर ने लगभग ग्यारह बजे अपनी आँखों में जलन महसूस की, परन्तु उसने इसे यह सोचकर नज़रंदाज़ किया की इस तरह की जलन होना आम बात थी. उसने मध्य रात्रि यह पाया की टेंक में ताप व दाब दोनों लगातार बढ़ रहे है. उसने यह सोचा कि हो सकता है शायद ताप -दाब मापी घडी का कांटा सही नाप नहीं बता रहा है,अतः उसने इसे हल्क़े में लिया. लगातार बढ़ते ताप व दाब के कारण रप्चर डिस्क फट गई और सेफ्टी वाल्व उड़ गया तथा रनवे रिएक्शन प्रारंभ हो गया. रनवे रिएक्शन की यह खास बात है की वह एक बार यदि प्रारंभ हो जय तो उसे रोकना अत्यंत कठिन कार्य है. उक्त टेंक में भरी मिथाईल आईसो साइनेट (एम्. आई. सी.) अर्थात " मिक " गैस दिसंबर की कडकडाती ठण्ड में ३३ मी. ऊँची मीनार से भोपाल शहर की हवा में फ़ैल गई. दुर्भाग्य से उस दिन हवा का रूख शहर की तरफ ही था. उसके बाद तो जो हुआ वो सभी ने देखा, जाना और आज भी जान रहे है. भोपाल का नाम हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो में भयानक औद्योगिक त्रासदी के लिए अमर हो गया.
अब हम इसे मानवीय भूल कहें या दोषयुक्त कार्य प्रणाली, क्योंकि पाईप में पानी पड़ने पर टेंक के अन्दर जाना और लगातार ताप-दाब में वृद्धि को नज़र अंदाज़ करना समझ में नहीं आता . दूसरा कारखाने में लगाये गए पांचो सेफ्टी सिस्टम जिसमें,
१. वेंट गैस स्क्रबर
२. फ्लेयर स्टेक टावर
३. वाटर कर्टेन
४. रेफ्रिजरेशन सिस्टम
५. स्पेयर स्टोरेज टेंक
होने के बावजूद अपनी कसौटी पर खरे नहीं उतरे. विभिन्न रिपोर्टों एवं जानकारी के अनुसार - स्क्रबर में कास्टिक सोडे द्वारा गैस को प्रभावहीन बनाया जाता था, परन्तु दुर्घटना के समय स्क्रबर सुधार कार्य में था. फ्लेयरस्टेकटावर में स्वचालित रूप से विषैली गैसों को हवा में जलाने का कार्य किया जाता था परन्तु दुर्घटना के समय इस टावर की पाईप लाइन में सुधार कार्य किया जा रहा था. वाटरकर्टेन यह वह पद्धति है जिसमें संवेदनशील क्षेत्रों में पानी के फौव्वारों द्वारा हवा में विसरित गैसों(यहाँ मिक ) को पानी में घोलकर डाई मिथाईल यूरिया अथवा ट्राई मिथाईल ब्युरेट बनाया जाता था परन्तु दुर्घटना के समय पानी के फौव्वारे चालू होने के बावजूद तीस मीटर की ऊँचाई तक पहुँच नहीं सके. रेफ्रिजरेशन सिस्टम, जो टेंक के अन्दर -१० से -१५ डिगरी सेंटीग्रेड तक के तापमान को बनाये रखने के लिए तीस टन क्षमता का रेफ्रिजरेशन सिस्टम डिज़ाइन किया गया था परन्तु दुर्घटना के समय वह चालू नहीं किया गया था. स्पेयर स्टोरेज टेंक, यह, "मिक" के भण्डारण के लिए साठ टन के तीन अतिरिक्त टेंकों की व्यवस्था की गयी थी परन्तु दुर्भाग्य से उस दिन उसमेंसे एक भी टेंक खली नहीं था. जब टेंक ६१० में दाब बढ़ा तो उसे दूसरे टेंक में स्थानांतरित किया जा सकता था. अब इसे लापरवाही कहें या दुर्भाग्य की घटना के समय वो सभी पहले से ही भरे हुए थे. यहाँ यह कहना सर्वथा उचित होगा की गैस थी इसलिए तो रिसी, नहीं होती तो क्यों रिसती. यह जानने के बाद मेरे दिमाग में क्या कोई भी सामान्य आदमी के दिमाग में प्रश्न उठाते है जैसे - जब कारखाने में उत्पादन कार्य बंद था तो १८० टन मिक गैस का भण्डारण उचित था? उसका अंतिम उत्पाद कार्बरिल क्यों नहीं बनाया गया ? क्या कारखाने वाले सभी मिक की तासीर से अनभिज्ञ थे?
ऐसा नहीं है कि कारखाना प्रबंधन और सरकार दोनों अच्छी तरह से कारखाने के बारे में नहीं जानते थे. भोपाल हादसे से पहले स्थानीय पत्रकारों द्वारा कई बार स्थानीय समाचार पत्रों में कारखाने सम्बन्धी प्रश्न उठाये गए थे परन्तु ऐसा लगता है जैसे उसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया अन्यथा यह दिन नहीं देखना पड़ता. प्राप्त जानकारी के अनुसार सन १९७५ तक कारखाने के चारों और काफी बसाहट हो चुकी थी. उस समय तत्कालीन भोपाल प्रशासक द्वारा कारखाने को कही अन्यत्र स्थानांतरित करने हेतु प्रयास किया था, परन्तु वे यशस्वी नहीं हो सके. सन १९८२ के लगभग कारखाने को लेकर में मध्यप्रदेश विधानसभा में भी प्रश्न उठाया गया. सरकार की तरफ से तत्कालीन श्रम मंत्री द्वारा इसका जवाब विधानसभा में दिया था और बताया गया था की कारखानें में सफेटी सम्बन्धी पूरी व्यवस्था है. कारखाने को कहीं अन्यत्र ले जाना कोई हंसी खेल नहीं है और भोपाल को कोई खतरा नहीं है. कारखाने को कहीं अन्यत्र ले जाना कोई हंसी खेल नहीं है और भोपाल को कोई खतरा नहीं है. ऐसे में यह बात तो सर मुंडाते ही ओले पड़े जैसी हुई. ऐसे में आज इस हादसे ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है की हमने इससे क्या सीखा ?
१.सभी देशों के नागरिकों की जिंदगी को समान रूप से आंकना चाहिए. जबकि होता यह है कि विकसित देश, विकासशील देशों के नागरिकों को दुह्यम दर्जे के रूप में आंकते है. हम भारतीयों की जिंदगी तो सस्ती, सुन्दर और टिकाऊ समझी जाती है.
२. विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में समान उपकरण और समान ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं लगाये जाते, जबकि उसमें एकरूपता होनी चाहिए.
३. विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में कारखाने की कार्यप्रणाली एवं सम्बंधित खतरों को समय -समय पर अवगत कराया जाना चाहिए.
४. विकसित देशों द्वारा जब विकासशील देशों में कारखाने लगाये जाते हैं तो उनकी जवाबदेही अधिक होनी चाहिए. भोपाल के केस में तो यूनियन कार्बाईड ने अपना पल्ला बड़ी खूबसूरती से झाड़ लिया.
५. स्टाफ एवं कर्मचारियों को समय-समय पर सेफ्टी सम्बन्धी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए.
६. विकसित देशों में एम.आई.सी. का भण्डारण बड़े-बड़े ड्रमों में किया जाता है तत्पश्चात उसे अलग भवन में रखा जाता है जिसके ऊपर स्वचालित फौव्वारों द्वारा पानी का छिडकाव किया जाता है तथा उसमें गैस डिटेक्टर लगे होते हैं.
७.भोपाल हादसे के बाद फ़्रांस द्वारा उनके यहाँ एम.आई.सी. का आयत बंद कर दिया था.
८. कारखानों के आसपास के लोगो को खतरों और आपातस्थिति के बारे में जानकारी एवं प्रशिक्षण देना चाहिए. जो भोपाल के केस में नहीं दिया गया था.
९. जनमानस को आग लगने का सायरन एवं गैस रिसने का सायरन अलग-अलग है इसके बारे में जानकारी देनी चाहिए. जो भोपाल के केस में नहीं दिया गया था.
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